संताल एक्सप्रेस संवाददाता
उधवा-झारखंड के सरकारी विद्यालयों में नौनिहालों के भविष्य को संवारने के लिए सरकार भले ही तमाम योजनाएं और लाखों-करोड़ों रुपये का बजट जारी कर रही हो. लेकिन धरातल पर बैठे लापरवाह शिक्षक और भ्रष्ट तंत्र इन व्यवस्थाओं को पूरी तरह पलीता लगा रहे हैं. इसका एक बेहद शर्मनाक और चौंकाने वाला मामला उधवा प्रखंड क्षेत्र के उत्तर पलाशगाछी पंचायत अंतर्गत सुरेन मंडल टोला उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय से सामने आया है. जहां शिक्षा व्यवस्था के नाम पर सिर्फ और सिर्फ बड़ा गड़बड़ घोटाला चल रहा है.
300 बच्चों का नामांकन, पर मिले सिर्फ 8 से 10 बच्चे
जब मीडिया टीम ने इस विद्यालय की जमीनी हकीकत जानने के लिए पहुंचा तो स्कूल की बदहाली देखकर दंग रह गए. विद्यालय के आधिकारिक दस्तावेजों और रिकॉर्ड के अनुसार स्कूल में लगभग 300 बच्चों का बड़ा नामांकन दर्ज है. लेकिन जब ठीक पूर्वाह्न 11:30 बजे पत्रकार टीम स्कूल परिसर पहुंची तो क्लासरूम में महज 8 से 10 बच्चे ही मौजूद थे.
प्रधानाध्यापिका गायब, बिना छुट्टी के शादी समारोह में
विद्यालय की प्रधानाध्यापिका रिहाना बानू स्कूल से पूरी तरह नदारद थीं. जब विद्यालय में मौजूद अन्य शिक्षकों से उनके बारे में पूछताछ की गई तो उन्होंने अजीबोगरीब सफाई देते हुए बताया कि प्रधानाध्यापिका के किसी रिश्तेदार के यहां शादी है. इसलिए वे वहां गई हुई हैं. जब फोन के माध्यम से प्रधानाध्यापिका रिहाना बानू से संपर्क किया गया तो उन्होंने खुद इस बात को स्वीकार किया कि उन्होंने विभाग से कोई आधिकारिक सरकारी छुट्टी नहीं ली है. बल्कि वे बिना सूचना के ही रिश्तेदार की शादी में शामिल होने चली गई हैं. एक जिम्मेदार पद पर बैठकर बिना अवकाश के स्कूल से गायब रहना और बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना प्रशासनिक लापरवाही की इंतहा को पार करता है.
सबसे बड़ा मुद्दा- स्कूल ड्रेस और जूता मिला, लेकिन किट से गायब रहे हाथ
इस पूरे मामले का सबसे मुख्य और गंभीर पहलू पठन-पाठन सामग्री के वितरण को लेकर है. जब पड़ताल की गई तो पता चला कि बच्चों को स्कूल ड्रेस और जूता तो दिया गया है. लेकिन इसके साथ मिलने वाला आवश्यक किट जिसमें पठन सामग्री बॉक्स जिसमें,पेंसिल, रबर आदि होता है.आज तक बच्चों को नहीं दिया गया है.जब मौके पर मौजूद मासूम बच्चों से सीधे बातचीत की तो बच्चों ने साफ शब्दों में बताया कि हमें आज तक स्कूल से कोई किट नहीं मिला है.शिक्षकों और प्रबंधन द्वारा किट वितरण के नाम पर इस तरह गोलमाल करना और बच्चों के हक का सामान दबा लेना सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है.
बुनियादी शिक्षा का भी अता-पता नहीं, बच्चे अपनी कक्षा तक बताने से अनजान
जिस विद्यालय में खुद प्रधानाध्यापिका अपने पद और जिम्मेदारी से गायब रहती हों. वहां बच्चों को क्या पढ़ाया जा रहा होगा. इसकी बानगी विद्यालय के भीतर साफ देखने को मिली. जब कक्षा में मौजूद 8-10 बच्चों से बातचीत की गई तो मासूम बच्चों को यह तक नहीं पता था कि वे किस कक्षा में पढ़ रहे हैं.बच्चों से पूछने पर वे केवल इतना बता पाए कि हम उस कमरे में पढ़ते हैं. इससे साफ जाहिर है कि इन नौनिहालों को बुनियादी शिक्षा और यह जानकारी तक नहीं दी जा रही है कि वे किस क्लास में नामांकित हैं. छोटी-छोटी मासूम बच्चियों को उनके क्लास का नाम तक नहीं पता है. जो शिक्षा व्यवस्था के बदहाल होने का सबसे बड़ा प्रमाण है.
शिक्षकों के अपने बच्चे प्राइवेट स्कूल में, गरीबों के बच्चों के हक पर डाका
ग्रामीणों ने गहरा रोष व्यक्त करते हुए एक और बड़ा खुलासा किया. ग्रामीणों ने बताया कि विद्यालय के शिक्षक अपने खुद के बच्चों को बाहर बड़े और महंगे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते हैं. लेकिन सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले गरीब और असहाय ग्रामीणों के बच्चों के हक और भविष्य के साथ इस तरह का खिलवाड़ किया जा रहा है. शिक्षक खुद अपने स्कूल की व्यवस्था सुधारने के बजाय इसे कागजों तक ही सीमित रखे हुए हैं.
मध्याह्न भोजन और डीलर से चावल का रहस्यमयी खेल
जब विद्यालय में मध्याह्न भोजन को लेकर पूछताछ की गई तो शिक्षकों की तरफ से अजीब तर्क दिया गया कि स्कूल में एमडीएम का चावल उपलब्ध नहीं है. फिर भी हम डीलर से मैनेज करके काम चला रहे हैं.अब सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह उठता है कि वह कौन सा राशन डीलर है. जो स्कूल को उधारी या बिना आधिकारिक आवंटन के चावल उपलब्ध करा रहा है.
क्या डीलर के पास इतना एडवांस चावल आ रहा है कि वह स्कूलों को दे रहा है या बेच रहा है.क्या इस प्रक्रिया में कोटे के चावल की कालाबाजारी या ग्रामीणों के हक के अनाज में हेराफेरी की जा रही है?
हाजिरी का फर्जीवाड़ा और 60% अटेंडेंस का खेल
मौके पर जब सिर्फ 8 से 10 बच्चे ही उपस्थित मिले तो यह सवाल खड़ा होता है कि कागजों में बच्चों की कितनी हाजिरी बनाई जा रही है. नियमों के अनुसार स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति का एक तय प्रतिशत (जैसे लगभग 60% हाजिरी) दिखाना और उसके आधार पर एमडीएम व अन्य योजनाओं का संचालन करना अनिवार्य होता है. और शिक्षक कागजों पर 60% बच्चों की हाजिरी दर्ज भी करते हैं. लेकिन सोमवार को जब धरातल पर मात्र 8-10 बच्चे ही मिले. तो उच्च अधिकारियों की उच्चस्तरीय जांच और तफ्तीश के बाद ही यह खुलकर सामने आ पाएगा कि कागजों पर कितने फर्जी बच्चों की हाजिरी दर्ज करके सरकारी बजट को सफाचट किया जा रहा है.
सीआरपी रुहुल अमीन/ राहुल अमीन की कार्यशैली भी कटघरे में
मामले की गंभीरता को देखते हुए कुछ ही देर बाद सीआरपी रुहुल अमीन (राहुल अमीन) निरीक्षण के लिए स्कूल पहुंचे. जब पत्रकारों ने उनसे इस गड़बड़ी को लेकर सवाल किया, तो शुरुआत में उन्होंने भी मामले पर पर्दा डालने की कोशिश की और पूरी सख्ती के साथ मना कर दिया कि बच्चों को सब कुछ मिल चुका है.लेकिन जब बच्चों को सीआरपी के सामने खड़ा करके सच्चाई पूछी गई. तो बच्चों ने बताया कि उन्हें किट नहीं मिला है.तब जाकर काफी देर बाद सीआरपी को भी अपनी जुबान नरम करनी पड़ी और उन्हें मानना पड़ा कि हो सकता है सामग्री न मिली हो.
ग्रामीणों की चेतावनी और आगे की कार्रवाई
स्थानीय ग्रामीणों ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि जिला शिक्षा पदाधिकारी, प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी और प्रखंड कार्यक्रम पदाधिकारी इस विद्यालय की औचक और निष्पक्ष जांच करते हैं. तो स्कूल की अंदरूनी पोल खुलकर सामने आ जाएगी.


