राज्य और राजनीति
चंदन मिश्र
“लोकसेवक” शब्द का मतलब सिर्फ सरकारी नौकरी नहीं है। इसका मतलब है – “लोक की सेवा करने वाला”। संविधान और गांधी जी के “अंत्योदय” के सिद्धांत के अनुसार अधिकारी का पहला धर्म जनता की सेवा होना चाहिए, न कि फाइल और प्रोटोकॉल।
झारखंड में वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर का सुरक्षा लौटाना, कैबिनेट में 3 मंत्रियों का वित्त विभाग की “फाइल लटकाने” की शिकायत करना और “नेशनल स्टेकहोल्डर्स कंसल्टेशन” में निवेश का दावा – इन सब घटनाओं के बीच एक सवाल फिर उठा है, हमारे अधिकारी “शासक” हैं या “सेवक”?
समस्या क्या है? झारखंड में अधिकारीशाही के तीन बड़े लक्षण दिखाई देते हैं।
फाइल राज और लेटलतीफी :
कैबिनेट बैठक में सुदिव्य कुमार सोनू, इरफान अंसारी, दीपिका पांडेय सिंह जैसे मंत्री भी खुले तौर पर कह चुके हैं कि “वित्त विभाग में महीनों तक फाइल लटकती है”। समय पर पैसा नहीं मिलता तो स्कूल, अस्पताल, सड़क का काम रुक जाता है।
ये “लोकसेवा” नहीं, “लोक को सेवा के लिए तरसाना” है।
प्रोटोकॉल बनाम समस्या समाधान : वित्त मंत्री को अतिरिक्त वाहन चाहिए था क्योंकि 16 जवान 3 गाड़ियों में फिट नहीं हो रहे थे। जवाब में वाहन देने के बजाय “एक वाहन वापस करो” का पत्र आ गया। मंत्री ने कहा – “पुलिस मुख्यालय से ऐसा आदेश नहीं था, फिर वित्त विभाग के एक अधिकारी संयुक्त सचिव ने कैसे लिखा?”
यहां अधिकारी ने समस्या सुलझाने के बजाय नियम की किताब खोल दी। लोकसेवक नियम का पालन करता है, पर लोकहित में लचीलापन भी दिखाता है।
जवाबदेही का अभाव :
29 जून को डीजीपी को पत्र गया, जवाब नहीं आया। संयुक्त सचिव ने अपना पत्र भेज दिया। जब मंत्री ने सुरक्षा लौटाई तब तीन पुलिस अधिकारी दौड़े आए। इसका मतलब सिस्टम तभी जागता है जब “ऊपर से दबाव” आए। आम आदमी की फाइल के लिए कौन दौड़ेगा?
इसके पीछे का क्या कारण है, ध्यान से देखें तो कुछ बातें स्पष्ट होती है।
औपनिवेशिक मानसिकता: हमारा प्रशासनिक ढांचा आज भी 1861 के पुलिस एक्ट और ब्रिटिश कलेक्टर राज पर चलता है। उस समय अधिकारी का काम “राजस्व वसूलना और कानून मनवाना” था, “सेवा करना” नहीं। 2000 में झारखंड बन गया, पर सोच नहीं बदली।
ट्रेनिंग की कमी: लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थान और एटीआई में अफसरों को कानून, बजट, फाइलिंग सिखाया जाता है। “संवेदनशीलता, संवाद और फील्ड विजिट” कम सिखाया जाता है। नतीजा: अफसर एसी कमरे से ऑर्डर निकालते हैं, बूढ़ा पहाड़ नहीं जाते।
राजनीतिक-प्रशासनिक टकराव: जब मंत्री और सचिव के बीच तालमेल नहीं होता तो फाइल पिसती है। मंत्री कहते हैं “काम करो”, सचिव कहते हैं “नियम नहीं है”। बीच में जनता पिसती है।
दंड का डर नहीं, पुरस्कार का लालच नहीं: अगर कोई अधिकारी 6 महीने फाइल लटकाए तो क्या होता है? ट्रांसफर। अगर कोई 15 दिन में काम कर दे तो क्या मिलता है? कुछ नहीं। तो मेहनत कौन करे?
“लोकसेवक” बनने के लिए क्या चाहिए? कम से कम पांच सूत्र ऐसे हैं, जिनके बारे में सरकार को विचार करना चाहिए।
झारखंड को अगर सच में “विकसित राज्य” बनाना है तो अधिकारियों को पांच बदलाव करने होंगे:
मानसिकता का बदलाव: “मैं मालिक नहीं, कर्मचारी हूं”।
संविधान की प्रस्तावना में “हम भारत के लोग” लिखा है। अधिकारी भी “हम” में से एक हैं। मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक पांच साल के लिए आते हैं। अधिकारी स्थायी हैं। इसलिए राज्य की निरंतरता की जिम्मेदारी उन्हीं की है। मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा “ऊपर वाले पर भरोसा है”। एक लोकसेवक को “जनता के भरोसे” पर खरा उतरना चाहिए।
समयबद्ध सेवा कानून: मध्य प्रदेश, राजस्थान में “लोक सेवा गारंटी कानून” है। 30 दिन में जाति प्रमाण पत्र, 15 दिन में पेंशन। नहीं देने पर अधिकारी पर जुर्माना। झारखंड में भी ऐसा कानून और सख्त मॉनिटरिंग चाहिए।
फील्ड से जुड़ाव अनिवार्य: हर आईएएस /पीसीएस अधिकारी के लिए साल में 30 दिन गांव में रहना अनिवार्य हो। बिना फील्ड के फाइल का दर्द नहीं समझ आएगा। “बूढ़ा पहाड़” जैसे इलाके में मंत्री जा सकते हैं तो अधिकारी क्यों नहीं?
तकनीक और पारदर्शिता: “नेशनल स्टेकहोल्डर्स कंसल्टेशन” में एआई नीति की बात हुई। उसी एआई का इस्तेमाल फाइल ट्रैकिंग में हो। हर फाइल का क्यू आर कोड। आवेदक मोबाइल से देखे कि फाइल किस टेबल पर कितने दिन से है। देरी पर ऑटो अलर्ट।
पुरस्कार और दंड दोनों: “कर्मयोगी भारत” मिशन के तहत अच्छे काम करने वाले अधिकारियों को दिल्ली में सम्मान मिले। और जो जानबूझकर फाइल रोकें, उन पर विभागीय कार्रवाई + रिकवरी।
झारखंड के लिए खास चुनौती –
झारखंड एक “युवा राज्य” है और “आदिवासी बहुल राज्य” भी। यहां दो अतिरिक्त जिम्मेदारियां हैं:
विश्वास जीतना: 25 साल में 3 बार राष्ट्रपति शासन लगा। लोगों को लगता है सरकारें आती-जाती हैं, अधिकारी ही असली “राजा” हैं। इस अविश्वास को तोड़ना होगा।
स्थानीय भाषा और संस्कृति: जब तक अधिकारी संथाली, मुंडारी, कुड़ुख नहीं समझेंगे, तब तक “लोक” से जुड़ नहीं पाएंगे। “भाषा विवाद” इसी का नतीजा है।
अधिकारी कब बनेंगे लोकसेवक?
इसके लिए इन बातों पर ध्यान देना होगा।
कानून: सख्त लोक सेवा गारंटी कानून
करुणा: जनता के दर्द को अपनी फाइल समझना
कर्तव्य: “मैं सरकार का अधिकारी हूं” के बजाय “मैं जनता का सेवक हूं” वाली सोच
वित्त मंत्री ने सुरक्षा लौटाकर एक प्रतीकात्मक संदेश दिया – “पद का मोह नहीं, काम का मोह है”। अगर यही भावना हर बीडीओ सीओ, डीएसपी, सचिव में आ जाए तो झारखंड बदलते देर नहीं लगेगी।
झारखंड के अधिकारी “लोकसेवक” उस दिन बनेंगे जिस दिन:
– एक गरीब की पेंशन की फाइल एक हफ्ते में पास होगी
– एक आदिवासी छात्र को स्कॉलरशिप के लिए 10 चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे
– एक निवेशक को “सिंगल विंडो” सच में सिंगल दिखेगी।
“नेशनल स्टेकहोल्डर्स कंसल्टेशन” में 99 हजार करोड़ का निवेश तभी आएगा जब निवेशक को भरोसा होगा कि यहां का अधिकारी “फाइल का देवता” नहीं, “समाधान का साथी” है।
सरकारें बदलती हैं, नीतियां बदलती हैं। पर अगर अधिकारी नहीं बदले तो झारखंड नहीं बदलेगा। और अधिकारी तभी बदलेंगे जब हम उन्हें “साहब” कहना बंद करके “सेवक” मानना शुरू करेंगे। क्योंकि लोकतंत्र में मालिक जनता है और अधिकारी सेवक होते हैं।
WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉
Join Now


