नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि भारत के दल-बदल विरोधी कानून में बहुत सारी दिक्कतें हैं, लेकिन इसे संसद में बैठे कानून बनाने वालों ने ही बनाया है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने ये टिप्पणी वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। सिब्बल ने संविधान की दसवीं अनुसूची (जिसमें दल-बदल विरोधी कानून शामिल है) की मौजूदा व्याख्या को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मुद्दों को आदर्श रूप से सदन के भीतर ही उठाया जाना चाहिए। बेंच ने कहा कि दसवीं अनुसूची का मकसद विधायकों के बीच के कामकाज को रेगुलेट करना है। हमने दसवीं अनुसूची के कामकाज को देख रहे हैं। इसमें बहुत सारी दिक्कते हैं। लेकिन इसे किसने बनाया? सांसदों ने बनाया है। सिब्बल ने बेंच से जवाब में कहा कि संसद सदस्य (सांसद) भी कभी-कभी अदालतों की तरह गलती कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि यह मुद्दा शायद कभी हल न हो, क्योंकि इससे सत्ता में बैठे लोगों को फायदा होता है। इसके बाद कोर्ट ने सिब्बल की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया, जिसमें राजनीतिक दलों के विलय जैसे मुद्दों पर बात की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई मुद्दे हैं। हम नोटिस जारी करेंगे। सिब्बल, जो खुद एक सांसद हैं। उन्होंने दसवीं अनुसूची की उस व्याख्या को चुनौती दी है जो अलग हुए गुटों को विलय का रास्ता अपनाकर दल-बदल विरोधी कानून से बचने की इजाजत देती है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आज सिब्बल से पूछा कि उन्होंने अनुच्छेद 32 के तहत याचिका क्यों दायर की। सिब्बल ने जवाब दिया कि इससे जुड़ा एक मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। उन्होंने कहा कि गोवा वाला मामला। वो तीन जजों की बेंच के सामने लिस्टेड है। लेकिन उसके अलावा, हमारी राजनीति पर इसके बहुत बड़े असर पड़ते हैं। राजनीतिक दल को फैसला लेना होता है। कृपया इस प्रस्ताव पर गौर करें। कृपया समस्या की गंभीरता को देखें। चुनावी नतीजों को बदला जा सकता है। अल्पसंख्यक बहुमत बन सकता है और बहुमत अल्पसंख्यक बन सकता है। विनोद उपाध्याय / 27 जुलाई, 2026


