विशेषज्ञ बोले- नदियों का पानी रोकना घर के नल की टोटी बंद करने जैसा नहीं
नई दिल्ली । आतंकवाद को पनाह देने वाले पाकिस्तान के खिलाफ खून और पानी एक साथ नहीं बह सकता की नीति पर चलते हुए भारत ने 23 अप्रैल 2025 को सिंधु जल समझौते को रोकने का फैसला किया था। हालांकि, इस फैसले के 17 महीने बीत जाने के बाद भी, पाकिस्तान को जाने वाली पश्चिमी नदियों का पानी जमीनी स्तर पर पूरी तरह रुक नहीं पाया है, जिससे इस बड़े कूटनीतिक कदम के वास्तविक प्रभाव पर सवाल उठ रहे हैं। यह फैसला पहलगाम में हुए आतंकी हमले के अगले दिन आया था। तत्कालीन विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने तब स्पष्ट किया था कि जब तक सीमा पार से होने वाला आतंकवाद पूरी तरह बंद नहीं हो जाता, तब तक यह समझौता रुका रहेगा।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सिंधु जल संधि के तहत सिंधु नदी सिस्टम की छह प्रमुख नदियों को भारत और पाकिस्तान के बीच बांटा गया है। रावी, ब्यास और सतलुज के पानी पर भारत का अधिकार है, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब का ज्यादातर पानी पाकिस्तान के लिए तय है। हालांकि, भारत को पश्चिमी नदियों के पानी का इस्तेमाल घरेलू जरूरतों, बिजली उत्पादन, खेती और पीने के लिए करने की छूट मिली है, और वह इन नदियों पर 3.6 मिलियन एकड़-फीट तक पानी जमा करने के लिए बांध भी बना सकता है।
नदियों के विशेषज्ञ बताते हैं कि समझौते को रोकने के ऐलान के बावजूद भारत पश्चिमी नदियों का एक बूंद भी अतिरिक्त पानी इस्तेमाल इसलिए नहीं कर पाया है क्योंकि नदियों का पानी रोकना कोई घर के नल की टोटी बंद करने जैसा नहीं है। इसके लिए बड़े-बड़े बांधों, जलाशयों और नहरों जैसे विशाल बुनियादी ढांचे की जरुरत होती है, जिसके निर्माण में शुरुआती सर्वे, विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट, पर्यावरण संबंधी मंजूरियां, हजारों करोड़ रुपए का बजट और कई सालों तक चलने वाला निर्माण कार्य शामिल होता है।
वर्तमान में भारत के पास पश्चिमी नदियों पर केवल 1 एमएएफ पानी जमा करने की क्षमता मौजूद है, जबकि संधि में उसे 3.6 एमएएफ तक पानी जमा करने की कानूनी इजाजत है, जिस रफ्तार से अभी काम चल रहा है, उसे देखते हुए भारत 2030 तक भी इस 3.6 एमएएफ की सीमा को शायद ही छू पाएगा। भारत सरकार जम्मू-कश्मीर में पकल दुल, कीरू, क्वार और रतले जैसे जलविद्युत परियोजनाओं पर काम की रफ्तार बढ़ा रही है, लेकिन इनमें से ज्यादातर रन-ऑफ-द-रिवर तकनीक पर आधारित हैं, जो बिजली तो बनाती हैं, पर पानी को बड़े जलाशयों में रोक नहीं सकतीं।


