संताल एक्सप्रेस संवाददाता
पाकुड़ । शहर के कालीतल्ला स्थित मां श्मशान काली मंदिर में करीब 350 वर्षों से चली आ रही पूजा की परंपरा इस वर्ष भी श्रद्धा और भक्ति के साथ निभाई जाएगी। तांत्रिक विधि-विधान और प्राचीन बंगाली पद्धति से होने वाली इस पूजा की खास पहचान ताल के पत्तों से घिरे घर और मशाल की रोशनी में होने वाला अनुष्ठान है। पूजा को लेकर मंदिर परिसर में तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। यहां 8 नवंबर की रात मां काली की पूजा-अर्चना होगी, जबकि 9 नवंबर को पूरे दिन मेले का आयोजन किया जाएगा।पूजा के बाद 9 नवंबर की शाम गोधूलि बेला में मां की प्रतिमा विसर्जन के लिए भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी। इस विसर्जन की परंपरा भी अनूठी है। मां की प्रतिमा को श्रद्धालु अपने कंधों पर लेकर नगर भ्रमण कराते हैं। इसके बाद शहर के कालीभसान पोखर में प्रतिमा का विसर्जन कर मां को विदाई दी जाती है। शोभायात्रा में हजारों श्रद्धालु शामिल होकर मां के दर्शन करते हैं।कालीतल्ला की मां श्मशान काली की पूजा में पाकुड़ के अलावा बिहार के भागलपुर और मुंगेर तथा पश्चिम बंगाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
यहां पश्चिम बंगाल के तारापीठ के पुरोहित प्रदीप भट्टाचार्य अपने सहयोगी तरुण पांडे के साथ तांत्रिक विधि-विधान से पूजा संपन्न कराते हैं। वहीं, दुलाल पांडे पूरे वर्ष मां काली की पूजा की तैयारियों और परंपराओं से जुड़े रहते हैं।स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मां श्मशान काली की पूजा की शुरुआत राजा पृथ्वीचंद्र शाही के शासनकाल में बांग्ला संवत 1222 के आसपास हुई थी। बताया जाता है कि पहले लिट्टीपाड़ा प्रखंड के पहाड़ी सफाहोड़ समुदाय के लोग मां की पूजा करते थे। बाद में राजा पृथ्वीचंद्र शाही के पाकुड़ आने और राजबाड़ी की स्थापना के बाद कालीतल्ला में पूजा की परंपरा शुरू हुई। स्थानीय बुजुर्गों के मुताबिक, मां काली के साथ यहां बूढ़ा शिव की भी स्थापना की गई थी।पूजा को लेकर पहाड़िया सफाहोड़ समुदाय के लोग भी अपनी परंपरा के अनुसार मंदिर परिसर की साफ-सफाई में जुटे हैं। तलवाड़ांगा, कालिदासपुर सहित आसपास के कई क्षेत्रों के लोगों की भागीदारी इस आयोजन को विशेष बनाती है।मां श्मशान काली की पूजा को सफल बनाने में श्मशान वासनी पूजा समिति के सदस्य जुटे हैं। समिति से जुड़े कुशु मंडल, अंशुमन चक्रवर्ती, सोनू सिंह, नीपु कर्मकार, प्रतीक घोष, अंशु राय, राणा सहित अन्य सदस्य तैयारियों में सहयोग कर रहे हैं। प्राचीन परंपरा, तांत्रिक अनुष्ठान और अनूठी विसर्जन यात्रा के कारण कालीतल्ला की मां श्मशान काली पूजा पाकुड़ की विशिष्ट धार्मिक पहचान बनी हुई है।


