नई दिल्ली । अगर आप भीड़-भाड़ वाले पर्यटन स्थलों से हटकर हिमाचल की थोड़ी-सी रहस्यमय संस्कृति को देखना चाहते हैं, तब शिमला के पास धामी की पूर्व रियासत में स्थित हलोग गांव की यात्रा आपको अचंभित करेगी। वहीं हिमाचल के लोग में सदियों पुरानी एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है, जिसे पत्थर मेला या बुग्गा मेला कहते हैं।यह रोमांचक और जोखिम भरा त्यौहार तब तक नहीं रुकता जब तक कि पत्थरों की बौछार में किसी एक व्यक्ति का खून न बह जाए। गांव के लोगों का अटूट विश्वास है कि यह रस्म क्षेत्र में सुख-शांति लाती है। यही वजह है कि यह मेला सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि हलोग की ऐतिहासिक पहचान और लोगों की अटूट आस्था का प्रमाण है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।
दरअसल, पुराने समय में धामी में मानव बलि की प्रथा थी और हर साल मां भीमा काली मंदिर में प्रथा को अंजाम दिया जाता था। बताया जाता हैं कि देवी को प्रसन्न करने के लिए दूर से पत्थर फेंके जाते थे और घायलों के रक्त को मंदिर में अर्पित किया जाता था। इसके बाद, पत्थरबाजी का यह खेल शुरू हुआ। पत्थर मेला हिमाचल के गांव में हर साल दीपावली के अगले दिन आयोजित होता है। जो कि कटेदु और झानोगी नामक दो समूहों के बीच यह खेल दोपहर में शुरू होता है और किसी के घायल होने पर समाप्त हो जाता है। पुजारी उस रक्त को एकत्र करते हैं और मंदिर में ले जाकर मां भीमा काली को तिलक लगाते हैं।
यही कारण है कि यह केवल खेल नहीं, बल्कि त्याग, साहस और सामुदायिक एकता का प्रतीक बन गया है। हलोग गांव का अनोखा सांस्कृतिक गौरव पत्थर मेला सिर्फ रोमांचक खेल नहीं, बल्कि हिमाचल की लोक परंपराओं और सांस्कृतिक इतिहास का जीवंत प्रमाण है। त्यौहार हिमाचल के लोग गांव के लोगों के लिए गहरी आस्था और गौरव का प्रतीक बन चुका है।


