नई दिल्ली । क्रिकेट के मैदान पर रिकॉर्ड्स का बनना और टूटना एक सामान्य बात है, लेकिन कुछ रिकॉर्ड ऐसे होते हैं जो दशकों तक अजेय रहते हैं और जब टूटते या बराबर होते हैं, तो इतिहास में दर्ज हो जाते हैं। ऐसा ही एक महाचमत्कार हाल ही में रणजी ट्रॉफी में देखने को मिला, जिसने 80 साल पुराने एक बेहद दुर्लभ रिकॉर्ड की बराबरी की है। यह रिकॉर्ड तब बना था जब किसी टीम के 10वें और 11वें नंबर के बल्लेबाजों ने एक ही पारी में शतक जड़े हों। यह घटना क्रिकेट के हर समीकरण को बदल देने वाली और यह सिखाने वाली थी कि जब तक आखिरी विकेट क्रीज पर है, तब तक हार नहीं मानी जा सकती।
यह अविश्वसनीय कहानी साल 1946 में लंदन के द ओवल मैदान पर भारत और सरे के बीच खेले गए मुकाबले से शुरू हुई थी। भारतीय टीम संघर्ष कर रही थी और महज 205 रनों पर अपने 9 विकेट गंवा चुकी थी। मैदान पर मौजूद दर्शकों और विरोधी टीम के लिए यह मैच बस एक औपचारिकता मात्र रह गया था, और हर किसी को लग रहा था कि भारतीय पारी कुछ ही पलों में सिमट जाएगी। तभी मैदान पर दो ऐसे खिलाड़ियों की एंट्री हुई, जिनसे किसी को रन बनाने की उम्मीद नहीं थी। एक थे लेग स्पिनर चंदू सरवटे और दूसरे थे मीडियम पेसर शूट बनर्जी। दोनों ही विशुद्ध रूप से गेंदबाज थे, जिन्हें आखिरी विकेट के रूप में केवल क्रीज पर टिकने की जिम्मेदारी मिली थी।
लेकिन क्रीज पर आते ही इन दोनों खिलाड़ियों ने अपने जज्बे, हिम्मत और बेखौफ बल्लेबाजी से सरे के गेंदबाजों की धज्जियां उड़ानी शुरू कर दीं। जिसे लोग खेल का अंत समझ रहे थे, वह दरअसल क्रिकेट इतिहास की सबसे बड़ी शुरुआत थी। चंदू सरवटे ने शानदार बल्लेबाजी करते हुए 124 रन बनाए, वहीं शूट बनर्जी ने भी पीछे न रहते हुए ताबड़तोड़ 121 रन ठोक दिए। दोनों ने मिलकर 10वें विकेट के लिए रिकॉर्ड तोड़ 249 रनों की साझेदारी की। यह क्रिकेट इतिहास का पहला ऐसा मौका था जब नंबर 10 और नंबर 11 के बल्लेबाजों ने एक ही पारी में शतक बनाए हों। इस चमत्कारी साझेदारी के दम पर भारत ने न केवल मैच में वापसी की, बल्कि अंत में इस मुकाबले को 9 विकेट से अपने नाम किया।
यह रिकॉर्ड इतना अद्भुत और अकल्पनीय था कि इसे टूटना तो दूर, इसके बराबर पहुंचना भी नामुमकिन लग रहा था। यह रिकॉर्ड लगभग 80 सालों तक अटूट रहा। इस जादुई आंकड़े की बराबरी आखिरकार साल 2025 में मुंबई के तनुश कोटियन और तुषार देशपांडे की जोड़ी ने रणजी ट्रॉफी के दौरान की। भले ही आधुनिक क्रिकेट में कई बड़े रिकॉर्ड बनते और टूटते रहते हैं, लेकिन 1946 की सर्दियों में शूट बनर्जी और चंदू सरवटे द्वारा लिखी गई यह दास्तान आज भी क्रिकेट गलियारों में जज्बे और वीरता की सबसे बड़ी मिसाल मानी जाती है। यह मैच क्रिकेट के इतिहास में हार न मानने के अटूट विश्वास का प्रतीक बन गया।


