बाढ़ राहत शिविर में नही जाना चाह रहे है दियारावासी, प्रशासन बार-बार राहत शिविर में पहुंचने का कर रहे है अपील
संताल एक्सप्रेस
अमित सिंह
साहिबगंज-जिले में आयी बाढ़ में दियारा क्षेत्रों में लाखों की आबादी घिरी हुई है.इस बीच पशुओं से इंसानी मुहब्बत की कई मिसालें सामने आ रही है.दियारा क्षेत्रों के लोग अपने पशुओं व आशियाने को छोड़कर शिविरों में जाना नही चाहते है. पशुओं की मुहब्बत में अपनी जिंदगी दांव पर लगा रखी है.शिविरों की राहत व आशियाने की मुहब्बत के बीच कुछ ऐसा ही है.यहां बाढ़ से घिरे दियारा वासियों की जिंदगी को संताल एक्सप्रेस अखबार ने उस भावना को कुरेद कर एक ऐसा एहसास को सामने लाने की कोशिश की है.जिसे लोग अपनों के बीच चहारदीवारी में सुरक्षा का नाम देते है.प्रशासनिक राहत शिविरों के वावजूद बाढ़ के बीच फंसे दियारावासी अपने घरों व पशुओं को छोड़ना पसंद नही कर रहे है.जान के खतरे के वावजूद अपने घरों में रहना उन्हें राहत दे रहा है.इस संबंध में बाढ़ पीड़ितों ने कहा कि लगभग 10-12 हजार लोग बाढ़ से घिरे है.फिलहाल लोग सरकारी चबूतरे व बांस के मचान पर शरण लिये हुए है.लोगो ने कहा कि शहर में बने राहत शिविर में जाने से घर का सारा सामान बर्बाद हो जाएंगा.बाढ़ पीड़ित परिवार सामान को अपने घर मचान पर बांध कर रखा है.घर में सामान छोड़ कर जाने से उसके चोरी होने या बाढ़ के पानी में बह जाने का डर सता रहा है.लोगो ने कहा कि पशुओं को भी नही छोड़ा जा सकता है.उनके भोजन व पानी की व्यवस्था भला कौन करेगा.मीना देवी ने कहा कि घर द्वार कैसे छोड़ दे.घर कोई गठरी तो नही जिसे हाथ में कर निकल जाये. हम लोगों ने मेहनत- मजदूरी कर तिनका-तिनका जोड़ कर सपनो का घर बनाएं है.संजय सिंह ने बताया कि पशुओं को बाढ़ के हवाले कैसे छोड़ दे.अच्छे दिनों में पशुओं ने उनकी बनायी.बुरे दिनों में उन्हें किस्मत के भरोसे कैसे छोड़ सकते है.खेती से लेकर अमृत समान दूध तक देने वाले पशुओं से बच्चों का भी लगाव है.यानि कुल मिलाकर कहा जाएं तो बाढ़ पीड़ित परिवार बाढ़ के बीच रहकर अपने घरों,सामानों व मवेशियों की देखभाल कर रहे है.


