एस.के.झा.सुमन
दुमका। विश्व में अलग-थलग पड़ते जा रहे आदिवासी जो विभिन्न प्रकार के परेशानियों से ग्रसित होते चले जा रहे हैं । उसकी स्थिति में सुधार लाने के लिए प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है । संताल परगना में रह रहे आदिवासी विभिन्न समस्याओं से ग्रसित हैं भले ही सरकार और सामाजिक संगठन इसके उत्थान में लगे रहने की बात कर रहे हैं लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है संताल परगना के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों से हमारे ब्यूरो प्रभारी ने बातचीत की तो कई प्रकार की परिस्थितियों जिसका समाधान जरूरी है वह छनकर सामने आई । —————————–
राजनीति और तुष्टिकरण से घट रही है आदिवासियों की संख्या : राजकिशोर हांसदा
पुरे झारखंड में जनजाति समाज की जनसं या घटने के अनेक कारण हैं। एक तो समाज ही अपने आप में कारण है। उनमें अशिक्षा, अंधविश्वास, गरीबी,नशा का अत्यधिक सेवन। जनजाति समाज में आधुनिक विकास का काफी कमी है। उसमें विकास के प्रति जागृति का अभाव है। आदिवासियों की जनसं या में गिरावट का एक बड़ी वजह जनजाति समाज का ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्मांतरण भी है। अत्यधिक सं या में रोहिंग्या, बंग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठ के कारण मुसलमानों की सं या बढऩा। विशेषकर संताल परगना के अनेक जिलों में अवैध तरीके से बंगलादेशी मुसलमानों का दास्तावेज बनाने वाले गिरोह सक्रिय है। ऐसे बंग्ला देशी मुस्लिम जनजाति महिलाओं को लक्ष्य बनाकर के लव जिहाद में फंसाते हैं और बाद में अवैध तरीके से शादी कर लेते हैं। झारखंड सरकार को खुफिया विभाग के द्वारा जांच करके अविलंब कारवाई करनी चाहिए। इस मामले में झारखंड सरकार काफी उदासीन है। जनजाति हितों की सुरक्षा को लेकर कड़ा कदम उठाना चाहिए। इसमें किसी प्रकार का राजनीति और तुष्टिकरण नहीं होना चाहिए।
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संताल परगना में आदिवासियों की निरंतर घटती जनसं या चिंताजनक : डॉ शर्मिला ए
सकेएमयू के प्रोफे सर डॉ शर्मिला सोरेन कहती हैं किे आजादी के बाद से ही आदिवासियों के पारंपरिक सामाजिक बदलाव और समृद्ध जीवन जीने के तौर तरीके में अनेकों परिवर्तनों के कारण उनकी मजबूत सामाजिक संगठन में कई परिवर्तन हुए। जिससे पारंपरिक जीवन -शैली में भी कई तरह के बदलाव हुए हैं । इन्हीं बदलाव के कारण सामाजिक ताना-बाना में बिखराव उत्पन्न हुई है। आदिवासियों की नई पीढ़ी दूसरी विचारधारा से प्रभावित होकर पलायन करना और शादी से वंचित होना भी एक ज्वलंत कारण है। जीविकोपार्जन के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करना और वहीं का होकर रह जाना और वहां के सरकार आदिवासियों को आदिवासी ना मानना आदिवासियों की जनसं या घटना का बहुत बड़ा कारण माना जा सकता है।
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पलायन, विस्थापन व धर्म कोड आदिवासियों की घटती जनसं या का कारक: प्रो निर्मल मुर्मू
एसपी कॉलेज के सहायक प्राध्यापक निर्मल मुर्मू कहते हैं कि आदिवासियों की घटती जनसं या का मु य कारण पलायन, विस्थापन के साथ साथ धर्म कोड के अभाव में जनगणना के समय हिंदू, मुस्लिम, ईसाई आदि में आदिवासियों का गणना है। इसके साथ ही आदिवासी बहुल क्षेत्र में आदिवासियों का जमीन पर बसे अवैध कब्जाधारियों का अनुपातिक रूप से अत्यधिक जनसं या वृद्धि दर है, जिसके सामने आदिवासी जनसं या बौना साबित होते जा रही है। आधुनिक दौर में बाजार शहर के आसपास उनके जमीन पर कब्जा करने के लिए सुनियोजित मंदिरापान और अत्यधिक मृत्यु दर है। आदिवासियों के पास जब तक जमीन रहेगा तब तक जीवन और जनसं या अस्तित्व में रहेगा, जिस दिन जमीन हाथ से निकल जाएगी उस दिन जीवन और जनसं या खतरे में होगा। आज जमीन लुटा रहा है इसलिए जनसं या भी खतरे में है। जिसका सीधे जि मेदार सरकार को जाता क्योंकि हर मर्ज की दवा सरकार के पास है।
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आने वाले दिनों में आदिवासी की जनसंख्या खतरे पर : बेबी लता टुडू
दुमका की समाजसेवी बेबी लता टुडू ने कहा की झारखंड में घटती आबादी सबसे बड़ा कारण यहां के भौगोलिक पृष्ठभूमि के आधार पर कोयला पत्थर बालू और खनिज संपदा का दोहन होना है। बारी-बारी से यहां के राजनेताओं ने खुले तौर पर खनिज संपदाओं का सौदा करने का काम किया। जिससे अपनी रोजी-रोटी के लिए दिन प्रतिदिन पलायन की समस्या बढ़ती गई। साथ ही आदिवासियों का अशिक्षित होना। नशापन का सेवन करना। अंतर्जातीय जातिय विवाह कर खुद की सभ्यता संस्कृति से अलग होना।। जिससे आदिवासी के घटती जनसंख्या में डेमोग्राफी का प्रभाव पड़ता गया और आदिवासी की जनसंख्या महज 26 प्रतिशत में सिमट कर रह गई ।जिससे आने वाले दिनों में आदिवासी की जनसंख्या खतरे पर है।
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सियासत ने आदिवासी की जनसंख्या को किया प्रभावित : डॉ हुडिंग मरांडी
एसकेएमयू के शोधार्थी डॉ हुडिंग मरांडी का कहना है कि झारखण्ड में आदिवासियों की घटती आबादी का एक बड़ा कारण यहां की राजनीतिकरण। इस प्रदेश में प्रकृति संपदा का दोहन सबसे ज्यादा आदिवासियों के जमीन के साथ हुआ है। सरकार की पुनस्र्थापना नीति ठीक नहीं होने के कारण यहां की आदिवासी पलायन के लिए मजबूर हो जाते हैं उसके बाद उसका सुदी लेने वाला कोई नहीं होता है। दूसरा कारण बांग्लादेशी घुसपैठी झारखण्ड आकर यहां की आदिवासी लड़कियों को प्रलोभन देकर उनके साथ शादी करके उनके जमीन को कब्जा करते हैं जिससे उनके सामाजिक संस्कृतियों पर दुष्प्रभाव पड़ता है।
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सरकार की नीति आदिवासी विरोधी : चंद्र मोहन हांसदा
सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रमोहन हांसदा का मानना है कि वास्तव में झारखंड बनने के बाद यहां का डेमोग्राफी तेजी से परिवर्तन हुआ है। विशेषकर यहां के सभी पार्टी के नेताओं द्वारा अन्य राज्यों ओर देशों के लोगों को मेहमान बनाकर बसाया गया है।यहां के संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम 1949 को ताक में रखकर भौगोलिक अतिक्रमण में अपना सहभागिता निभाया । झारखंड में आदिवासी विरोधी सरकार की गलत नीति के कारण अपने पूर्वजों के जमीन का सौदा करना इनका पेशा बन गया। बड़े-बड़े कारपोरेट घराने के लोगों ने झारखंड के जमीन का सौदा सत्ता में काबिज बड़े-बड़े राजनेताओं के माध्यम से किया है। पाकुड़,साहिबगंज, दुमका, जामताड़ा, गोड्डा, में बांग्लादेशी घुसपैठ का आना आदिवासी की घटती जनसं या में बहुत बड़ा कारक है।। लोकतांत्रिक व्यवस्था में धीरे-धीरे एक योजनाबद्ध तरीके से मुस्लिम समुदाय के द्वारा आदिवासी महिलाओं को आगे कर पंचायती राज व्यवस्था से लेकर लोकसभा तक तेजी से पूरे सिस्टम को प्रभावित कर रहे हैं।सरकार चाहे जिसकी रही हो सबों ने वोट बैंक के लिए इन बांग्लादेशी घुसपैठियों को संरक्षण देते गए। जिससे पूरा झारखंड के साथ-साथ संथाल परगना का डेमोग्राफी परिवर्तन हुआ।
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कानून पालन में कोताही एवं विस्थापन आदिवासी जनसंख्या को कर रही प्रभावित : दीपिका मुर्मू
दुमका की अधिवक्ता दीपिका मुर्मू कहती हैं कि आदिवासियों की जनसं या में कमी होने के कारण तो बहुत हैं पर यहां से आदिवासियों का विस्थापन प्रमुख है। विस्थापन से आदिवासियों में बेरोजगारी में बताशा वृद्धि हुई है। आज यहाँ विभिन्न नौकरियों में स्थानीय को प्राथमिकता न मिलने और यहाँ पर आदिवासीयों के लिए मौजूद विशेष कानून का सही से लागू नहीं होने एवं अन्य राज्यों के गैर आदिवासी का बस जाना से स्थानीय आदिवासी पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं। दूसरी और हमारे झारखण्ड में विभिन्न सुदूर इलाकों तथा अन्य गाँव शहरों में शराब की लत भी है। जिससे कम आयु में लोगों की मृत्यु हो जाती है। इनसे जनसं या में निरंतर वृद्धि में कमी आई है।
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शिक्षा के प्रसार में कमी से घट रही है आदिवासियों की जनसंख्या : प्रतिभा टुडू
इग्रू अध्ययन केंद्र एसपी कॉलेजदुमका के कोऑडिनेटर प्रतिभा टूडू कहती हैं कि शिक्षा के अभाव के कारण आदिवासी समाज का पलायन, बेरोजगारी और अस्तित्व के लिए संघर्ष करते देखा जा सकता है। इस समाज को जितना लाभ पहुंचाना चाहिए था वह नहीं पहुंच पाया है। सरकार ने अपने स्तर से लाभ पहुंचाने का प्रयास तो किया है पर अभी तक धरातल पर उतारने की जितनी कवायद होनी चाहिए उतना नहीं हो पाया है, इसका मूल कारण मैं देखती हूं कि शिक्षा का सही से प्रचार प्रसार ना होना है। आदिवासी समाज अपनी अस्मिता और अस्तित्व को लेकर संवेदनशील होकर निर्णय नहीं ले पा रही है ।इसका मूल कारण शिक्षा ही है, हालांकि शिक्षा का शहर पर प्रभाव है परंतु सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी इसका अभाव साफ देखा जा रहा है। उ मीद की जानी चाहिए कि शिक्षा का प्रभाव पढ़ते ही जनसं या, पलायन, बेरोजगारी और स्वास्थ्य सहित अन्य आवश्यक सभी जरूरतों पर अनुकूल प्रभाव पड़ेगा।


