नई दिल्ली । संचार साथी एप पर मोदी सरकार को काफी विरोध का सामना करना पड़ा है। इसके बाद केंद्र सरकार ने अपने फैसले को बदल दिया। अब संचार साथी एप को प्री-इंस्टॉल करना जरूरी नहीं है। पहले केंद्र सरकार ने मोबाइल निर्माताओं को 120 दिनों का वक्त दिया था। कंपनियों को भारत में बिकने वाले और इस्तेमाल होने वाले सभी फोन में संचार साथी एप को प्री-इंस्टॉल्ड देना था। हालांकि, विपक्ष के विरोध के बाद केंद्र सरकार ने फैसले को वापस ले लिया है।
डेटा प्राइवेसी व ट्रेसबिलिटी विवाद पर वॉट्सएप और भारत सरकार का टकराव हुआ था। केंद्र सरकार ने आईटी नियमों के तहत चैट मैसेज की ट्रेसबिलिटी की मांग की थी, जबकि वॉट्सएप एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन फीचर देता है। केंद्र सरकार चाहती थी कि देश की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर या फिर किसी अफवाह के फैलने पर ये पता किया जा सके कि उस मैसेज का फर्स्ट सेंडर कौन है। मामला इतना बढ़ गया कि वॉट्सएप मामले को लेकर कोर्ट पहुंच गया। इस मामले में अभी कोई फैसला नहीं आया है।
एक्स और भारत सरकार
ये मुद्दा कंटेंट मॉडरेशन और अकाउंट ब्लॉकिंग का था। किसान आंदोलन, फेक न्यूज और सुरक्षा मामलों पर केंद्र सरकार ने कई अकाउंट्स और पोस्ट्स को हटाने के लिए ट्विटर से कहा था। ट्विटर ने सरकार के कुछ आदेशों पर आपत्ति जताई, जिसके बाद तनाव बढ़ा था। हालांकि, इस मामले में एक्स को भारत सरकार के ज्यादातर आदेशों को मानना पड़ा था।
एप्पल और भारत सरकार
निजता को लेकर दुनिया की टिग्गज टेक कंपनी एप्पल का भी केंद्र सरकार से टकराव हो चुका है। दरअसल, आईफोन ने फोन प्रोटेक्शन को लेकर एक वॉर्निंग जारी की थी। ये वॉर्निंग कई नेताओं और पत्रकारों के फोन पर आई थी, जिसमें कहा गया था कि उनके फोन पर स्पाईवेयर अटैक हुआ है। विपक्ष ने मुद्दे को लेकर सरकार पर आरोप लगाया था कि वे लोगों की जासूसी की कोशिश कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने इस पर एप्पल से सफाई मांगी थी। इसके बाद एप्पल ने इस मुद्दे पर सफाई देकर कहा कि ये अलर्ट संभावित खतरे पर बेस्ड था, ना कि कन्फर्म अटैक पर।
गूगल और सरकार
सीसीआई ने गूगल पर एंड्रॉयड और प्ले स्टोर के दबदबे को लेकर 2200 करोड़ रुपये का फाइन लगाया है। इस मामले में गूगल पर एंड्रॉयड की मोनोपॉली, ऐप स्टोर्स के नियम जबरदस्ती लागू करने और कंपटीशन खत्म करने जैसे आरोप लगे। सीसीआई के फाइन के बाद गूगल ने कई बदलाव किए। ये सालों में पहली बार हुआ था, जब गूगल ने अपने मॉडल में कोई बदलाव किया हो। हालांकि, अभी भी ये मामला पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है।
ब्लैकबेरी और भारत सरकार
एक वक्त था जब ब्लैकबेरी भारत में राजनेताओं का फोन कहा जाता था। ये डिवाइस बिजनेस क्लास की पहचान और सबसे सुरक्षित मोबाइल माना जाता था। 2008–2013 के बीच भारत सरकार और ब्लैकबेरी के बीच इतना बड़ा विवाद हुआ कि भारत में कंपनी का मार्केट शेयर लगभग खत्म हो गया।
मेटा और सरकार
मेटा से संसद समिति ने फेसबुक पर हेट स्पीच, राजनीतिक कंटेंट और डेटा सुरक्षा को लेकर कड़ी पूछताछ की। केंद्र सरकार ने मेटा से पूछा था, क्या आपकी नीतियां भारत के लोकतंत्र को प्रभावित कर रही हैं? इसके बाद मेटा को अपने कई नियमों का स्पष्ट करना पड़ा।
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