भोपाल । मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने ट्विशा शर्मा आत्महत्या मामले की आरोपी रिटायर्ड जज गिरिबाला सिंह के खिलाफ दहेज के लिए परेशान करने का आरोप हटा लिया है। गिरिबाला सिंह के वकील ने बुधवार को हाईकोर्ट को यह जानकारी दी, साथ ही अपनी मुवक्किल के लिए जमानत अर्जी भी दाखिल की। गिरिबाला सिंह अपने बेटे और ट्विशा के पति समर्थ सिंह के साथ फिलहाल जेल में हैं। इस नई जानकारी के बाद, हाईकोर्ट ने गिरिबाला सिंह के वकील को जमानत की संशोधित अर्जी दाखिल करने का निर्देश दिया है और मामले की अगली सुनवाई के लिए 8 अक्टूबर की तारीख तय की है।
वकील सुरेंद्र सिंह ने कोर्ट को बताया कि 14 अगस्त को दाखिल चार्जशीट में सीबीआई ने गिरिबाला सिंह पर दहेज से जुड़े कोई आरोप नहीं लगाए हैं। चार्जशीट में कहा गया है कि गिरिबाला और समर्थ सिंह ने भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 85 (पति और उसके परिवार के सदस्यों द्वारा क्रूरता और उत्पीड़न), 108 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और 3(5) (साझा इरादा) के तहत अपराध किए हैं। हालांकि, सीबीआई को दहेज के लिए उत्पीड़न से जुड़ा कोई ठोस सबूत नहीं मिला है। मूल जमानत अर्जी में इस बात का जिक्र नहीं था कि सीबीआई ने उन पर दहेज से जुड़े आरोप नहीं लगाए हैं, जिसके चलते हाईकोर्ट ने संशोधित अर्जी दाखिल करने को कहा।
गिरिबाला के वकील ने आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में उनकी जमानत की अपील करते हुए कहा कि वह पिछले पांच महीनों से जेल में हैं। वहीं, ट्विशा के वकील अनुराग श्रीवास्तव ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सीबीआई की 600 पन्नों की चार्जशीट में समर्थ और गिरिबाला सिंह पर ट्विशा को लगातार मानसिक रूप से प्रताड़ित करने और आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि एजेंसी ने दहेज की मांग और दहेज के कारण मौत के दावों की जांच अभी खुली रखी है। श्रीवास्तव के अनुसार, जांच अभी जारी है और आरोपियों के मोबाइल फोन और लैपटॉप से मिले डिजिटल सबूतों की फोरेंसिक एनालिसिस रिपोर्ट का इंतजार है।
मॉडल ट्विशा शर्मा ने अपने पति समर्थ सिंह से शादी के पांच महीने बाद, 12 मई 2024 को आत्महत्या कर ली थी। पुलिस ने उनकी सास गिरिबाला और पति समर्थ के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और दहेज निषेध कानून के तहत मामला दर्ज किया था। शुरू में, गिरिबाला सिंह को 15 मई को भोपाल जिला और सत्र न्यायालय से अग्रिम जमानत मिल गई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने 27 मई को उनकी यह जमानत रद्द कर दी थी। हाईकोर्ट ने इस मामले में मृतका का दोबारा पोस्टमार्टम दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की टीम से कराने का भी आदेश दिया था। राज्य सरकार ने बाद में इस संवेदनशील मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी थी।


