आलबिनुस हेम्ब्रम
लेखक, समाजिक कार्यकर्ता पुने, महाराष्ट्र मुझे गर्व है आदिवासी होने का। आदिवासी, जिसका अर्थ ‘मूल निवासी’ है। ‘आदिवासी’ वे लोग हैं जो सदियों से अपने पूर्वजों के भूमि पर रहते आ रहे हैं और उनके अपने विशिष्ट संस्कृति परंपराएं भाषाएं और जीवनशैली से जाने जाते हैं। कोई शक नहीं कि आज पूरा विश्व में आदिवासी सफालता की शीर्ष छू रहे हैं। राजनीति, खेलकूद, साहित्य तथा व्यवसाय में आगे आ चुके हैं। कौन नहीं जानता कि भारत का प्रथम नागरिक महामहिम राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू एक आदिवासी समाज से आते हैं? हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री झारखंड, साहित्यकार रामदयाल मुंडा, जयपालसिंह मुंडा, जमुना टुडू जो आदिवासी भूमि पर जंगलों को नष्ट करने वाले माफिया के खिलाफ लडऩे के लिए खड़े हुए। और कई ऐसे महान व्यक्ति हैं जिन्होंने आदिवासी होने का दूनिया को एक अलग परिचय दिये हैं। जिनका नाम स्वर्ण अक्षरों से इतिहास के पन्नों में लिखा गया है। आदिवासी दुनिया के सभी क्षेत्रों में रहते हैं और वैश्विक भूमि क्षेत्र का लगभग 22त्न हिस्सा रखते हैं। वे विश्व की अनुमानित 7,000 भाषाओं में से अधिकांश भाषाएँ बोलते हैं और 5,000 विभिन्न संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। बहुत सारे इतिहासकार बताते हैं कि भारत में आदिवासी आर्यन से पहले बसे हैं। मतलब आदि से वास कर रहे हैं इसलिए उनको हमेशा रंगीन वेशभूषा, उनके नृत्य और लोकगीत के माध्यम से बहुत ही रूढि़वादी तरीकों से चित्रित किया जाता है। ये लोग सभी जगह जंगल, पहाड़, पर्वत , नदी-नाला, तथा खेत पठार पर बसे हुए हैं और यही कारण हो सकता है प्रकृति और आदिवासी के बीच एक अटूट संबंध है।जब तक आदिवासी हैं तब तक प्रकृति है। वे एक दूसरे के हिस्से हैं। प्रकृति को इनसे अलग नहीं किया जा सकता है। क्योंकि उसमें आत्मा है, ज्ञान है और जीवन है जो केवल मनुष्य के लिए ही नहीं बल्कि हर छोटी-बड़ी प्राणियों का आत्मा है। प्रकृति का प्यार एक ऐसा अनुभव है कि उसके संग रहने से कोई भी फ़ौरन हंसना और मुस्कुराने लगते हैं। आदिवासी से हम एक अनमोल जीवन जीने का तरीका सीखते हैं। अर्थात प्रकृति का सम्मान करना हमारा कर्तव्य बनता है। प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मनाते हैं। इसका तात्पर्य यह रहता है कि जल जंगल जमीन और आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए जागरूकता बढ़ाना। पता नहीं 1855-1856 संताल विद्रोह से अब तक अपनी अस्तित्व को बचाने के लिए कितने आंदोलन किये हैं। न्याय की दरवाजा कितनों बर खटखटायें हैं पर किसी ने हमारी गुहार सुना नहीं। हम चिल्लाते रह गए: हम हैं आदिवासी हम हैं मूल निवासी हम हैं प्रकृति पूजक जीव, जंतु, पहाड़, पर्वत नदी नाला के रक्षक हम हैं आदिवासी। जल, जंगल, जमीन हमारा करते रहेंगे यही नारा हम हैं आदिवासी हम हैं मूल निवासी। आज अगर देखें तो पूरा का पूरा झारखंड खोखला नजऱ आता है। कहीं से लोहा, कोयला, अभ्रक, पत्थर, बालु जैसे खनिज संपादकों को खूलेआम लूटा जा रहा है। संताल परगना का दुमका से लेकर साहेबगंज तक जाने के रास्ते में न जाने कितने अवैध पत्थर खनन मिलेंगे। लालमटिया में राजमहल कोयला खनन परियोजना से विस्थापित परिवारों ने ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड (ईसीएल) कंपनी पर पुनर्वास और मुआवजा के लिए कितनों बार कोर्ट कचहरी का चक्कर लगायें हैं। मसानजोर डैम प्रोजेक्ट में 144 गांवों को विस्थापित कर मुआवजा तक नहीं दिया गया है। मुआवजा तो दूर की बात न ही शुद्ध पेयजल तथा इलेक्ट्रिसिटी की आपूर्ति की गई है। अब दुमका के शिकारीपाड़ा ब्लॉक में 84 गांवों को विस्थापित करने का काम जोरों पर है। शिकारीपाड़ा में तीन कोल कंपनियों को कोल ब्लॉक आवंटित किया गया है। जमीन अधिग्रहण के लिए गांव के रैयतों को जमीन खाली करने का नोटिस भेज भी दिया है। आदिवासियों के साथ अनगिनत शोषण हो रहा है। कहीं कोई किसी के सर पे पेशाब कर देता है तो कहीं सड़कों पर महिलाओं को नंगा घुमाया जाता है। बीते साल मणिपुर में कुकी आदिवासीयों के साथ हुई वायलेंस पूरा दूनिया को झकझोर कर दिया है। 27 जुलाई 2024 पाकुड़ केकेएम कॉलेज में आदिवासी छात्रों के साथ हुई घटना आदिवासियों को जड़ से ही खत्म करने का संकेत देती है। पता नहीं अब कौन हमारा मसीहा बनकर आयेंगे? सरकार तो वोट बैंक के लिए समाज को टूकड़े टूकड़े कर बांट दिया है। धर्म पे राजनीति करने का ठिका लिया है। अब आदिवासी के बीच में अशांति उत्पन्न होने जैसा तस्वीर सामने आ रही है। हमें आपस में लड़ाया जा रहा है। इससे साफ साबित हो रहा है कि आने वाले दिन में हमारा अस्तित्व नहीं बचेगी। आज हमें संकल्प लेना है; अपनी संस्कृति, परंपराएं, रीति-रिवाज को जीवित रखना है। अपने हक और अधिकारों के सुरक्षा के लिए संघर्ष करना है। जय आदिवासी दिवस


