चोलों के विशाल समुद्री व्यापार नेटवर्क और साम्राज्य के वैभव की दे रहे गवाही
नई दिल्ली । हजारों सालों बाद, भारत के एक अत्यंत शक्तिशाली राजवंश, चोलों से जुड़ा एक पूरा शहर समुद्र के अंदर खोजा गया है, जिसने अपनी भव्य नौसेना के दम पर सुमात्रा, मलेशिया, थाईलैंड और कंबोडिया जैसे दूर-दराज के इलाकों पर राज किया था। यह राजवंश जो अपनी कुशल स्थानीय शासन व्यवस्था, पंचायत और ग्राम सभाओं के लिए जाना जाता था, अब यह चर्चा में है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक तमिलनाडु के पुरातत्व विभाग की टीम ने बंगाल की खाड़ी में दो सप्ताह की गहन खोजबीन के बाद समुद्र के अंदर 200 से ज्यादा मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े, प्राचीन संरचनाओं की तस्वीरें और खास टॉरपीडो जार खोजे हैं। ये टॉरपीडो जार, जो प्राचीन काल में फारस की खाड़ी के व्यापार नेटवर्क में शराब और अन्य सामान के परिवहन के लिए इस्तेमाल होते थे, चोलों के विशाल समुद्री व्यापार नेटवर्क और उनके साम्राज्य के वैभव की गवाही देते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक पुरातत्वविदों और भूवैज्ञानिकों का मानना है कि तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व की यह समृद्ध नगरी, भयंकर सुनामी और समुद्री कटाव के कारण पानी में समा गई। वनागिरी का एल्लईअम्मन मंदिर इसका उदाहरण है, जो 1991 तक तट पर था, लेकिन अब समुद्र के 100 मीटर अंदर जा चुका है। इस खोज ने एक बार फिर उस भारतीय राजवंश की कहानी को ताजा कर दिया है, जिसने नौवीं सदी से तेरहवीं शताब्दी तक दक्षिण भारत में शासन किया और दक्षिण-पूर्वी एशिया के द्वीपों पर भी अपना आधिपत्य स्थापित किया। जानकारी के मुताबिक चोलों के पास इतनी बड़ी और शक्तिशाली नौसेना थी, जो उस समय किसी अन्य राजवंश के पास नहीं थी और इसके बल पर उन्होंने श्रीविजय साम्राज्य को हराया था जो आज इंडोनेशिया है जो मलक्का जलडमरूमध्य पर हावी था। सम्राट राजेंद्र चोल ने भारत से 3,000 किलोमीटर दूर स्थित इस साम्राज्य पर साठ से ज्यादा युद्धपोतों के बेड़े के साथ चढ़ाई की और चीन के साथ होने वाले व्यापारिक समुद्री मार्गों पर अपनी पकड़ मजबूत की। उनका यह अभियान सिर्फ शक्ति प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि व्यापारिक हितों को साधने के लिए था।
चोल राजवंश अपनी स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था के लिए भी इतिहास में विख्यात है, उनके शासनकाल में कांस्य की नटराज मूर्तियां और भगवान शिव की दक्षिणेश्वर मुद्राएं अत्यंत प्रसिद्ध हुईं। द्रविड़ कला अपने चरम पर इन्हीं के काल में पहुंची और तंजौर में बृहदेश्वर या राजराजेश्वरी का भव्य मंदिर बनाया गया। विजयालय ने पल्लवों के सामंत के रूप में शुरुआत की, लेकिन बाद में एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर तमिलनाडु के तंजावुर को अपनी राजधानी बनाया। चोल शासकों ने मंदिरों में शिलालेख लिखवाने की प्रक्रिया को भी शुरू की, जो इससे पहले के मंदिरों में नहीं थी और यह उनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का अहम पहलू है।


