जितेन्द्र दास
पाकुड़। हूल दिवस प्रत्येक वर्ष 30 जून को मनाया जाता है ।यह दिन 1855 के संथाल हूल विद्रोह की स्मृति में मनाया जाता है । हूल शब्द का अर्थ है विद्रोह क्रांति या अन्य के विरुद्ध संघर्ष । यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआती और महत्वपूर्ण जन आंदोलन में से एक माना जाता है ।
प्रमुख लोगों के विचार
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आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा का संदेश देता है: दानियल हूल
दिवस 1855 के संथाल हुल (विद्रोह) की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 30 जून को जाता है। इस ऐतिहासिक विद्रोह का नेतृत्व सिदो मुर्मू, कान्हू मुर्मू, चाँद मुर्मू और भैरव मुर्मू ने अंग्रेजी शासन तथा शोषणकारी महाजनी व्यवस्था के विरुद्ध किया था।हुल दिवस हमें स्वतंत्रता, साहस, सामाजिक न्याय और आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा का संदेश देता है। इस अवसर पर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है तथा उनके संघर्ष और बलिदान को याद किया जाता है।
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आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा का संदेश देता है हूल दिवस : मार्क बस्की
फूल दिवस 1855 के संथाल रूल स्मृति में प्रत्येक वर्ष 30 जून को मनाया जाता है ।इस ऐतिहासिक विद्रोह का नेतृत्व कानून सिदो मुर्मू, कान्हु मुर्मू, चांद मुर्मू और भैरव मुर्मू ने अंग्रेजी शासन तथा शोषणकारी ,महाजनी व्यवस्था के विरुद्ध किया था। हुल दिवस हमें स्वतंत्रता, साहस, सामाजिक न्याय और आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा का संदेश देता है।
जेकेएलएम जिला अध्यक्ष
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आदिवासी समाज के गौरवशाली इतिहास कि हमें याद दिलाता है हूल : अजीजुल इस्लाम
हूल दिवस आदिवासी समाज के गौरवशाली इतिहास कि हमें याद दिलाता है। हमें अपने महापुरुषों के आदर्शों को अपनाकर समाज में एकता भाईचारा और न्याय की भावना को मजबूत करना चाहिए। हमें संकल्प लेना चाहिए कि अपने इतिहास संस्कृति और विरासत का सम्मान करेंगे और समाज में शांति समानता और सद्भावना बनाए रखने के लिए अपना योगदान देंगे।
झामुमो जिला अध्यक्ष
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हूल अन्याय और शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने का प्रेरणा का प्रतीक : प्रो निर्मल मुर्मू
हुल दिवस केवल एक ऐतिहासिक दिवस नहीं बल्कि अन्याय और शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने का प्रेरणा का प्रतीक है। यह हमें अधिकारों और सम्मान की रक्षा का संदेश देता है। किंतु वर्तमान समय में हमें अपनी सम्मान के लिए लगता है कि एक और हुल की आवश्यकता है।
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स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष का नमन करने का अवसर : चंदन भगत
हूल सिदो- कन्हू, चांद – भैरव और सभी वीर शहीदों के साहस बलिदान तथा स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष का नमन करने का अवसर है। यह हमें आदिवासी समाज के गौरवशाली अतीत के इतिहास को याद दिलाता है। इस अवसर पर हम अपने प्रेरणा के स्रोत सिदो – कन्हू, चांद – भैरव जी को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।
समाजसेवी
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शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने की प्रेरणा : चित्रलेखा गौर
आजादी हमें यूं ही नहीं मिली है। आजादी की जंग की शुरुआत में वीर सिदो- कन्हू, चांद – भैरव जैसे वीर योद्धा ने संथाल विद्रोह से इसे शुरुआत की थी। यह हमें हमेशा शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने की प्रेरणा देती है। जो आज भी कायम है
पूर्व मुखिया
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स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा देने में प्रेरणा का स्रोत : रिचा कुमारी
संथाल हुल की शुरुआत 30 जून 1855 को भोगनाडीह से शुरू हुई थी। इस आंदोलन का नेतृत्व सिदो मुर्मू , कान्हू मुर्मू ,चांद मुर्मू, भैरव मुर्मू ने किया था। उन्होंने कहा कि इस संघर्ष में उनकी बहन फूलों मुर्मू और झानो मुर्मू का भी महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। उस समय अंग्रेजी शासन जमींदारों और महाजनों द्वारा आदिवासी समुदाय को शोषण किया जा रहा था। इस आंदोलन का उद्देश्य शोषण से मुक्ति और सम्मान पूर्वक जीवन का अधिकार प्राप्त करना था। यह आंदोलन भारत के स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा देने में प्रेरणा का स्रोत रहा है। ऐसे वीर सपूत को नमन है।
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संतालों ने हिम्मत से अंग्रेजी सिपाहियों और जमीदारों का मुकाबला किया था : बिकास रविदास
संथालों ने बेहद हिम्मत से अंग्रेजी सिपाहियों और जमीदारों का मुकाबला किया। अंग्रेजों ने भी पूरी क्रूरता के साथ विद्रोहियों को रोकने का प्रयास किया। सिद्धू और कान्हू दोनों भाइयों को पकड़ लिया गया और पेड़ से लटकाकर 26 जुलाई 1855 को फांसी दे दी। इन्ही शहीदों की याद में हर साल पूरा देश हूल क्रांति दिवस मनाता है।
झामुमो हिरणपुर प्रखंड उपाध्यक्ष


