चंदन मिश्र
झारखंड की मिट्टी में जो सबसे गहरी आवाज गूंजती है, वो है “हूल जोहार” की। “हूल” संताल भाषा का शब्द है – अर्थात “विद्रोह”, “क्रांति”, “एकजुट होकर उठ खड़ा होना”। 30 जून 1855 को राजमहल की पहाड़ियों से उठी यही आवाज अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला गई थी। हूल दिवस सिर्फ एक तारीख नहीं है। यह उस पीड़ा की गवाही है जो शोषण से पैदा होती है, उस साहस की मिसाल है जो तीर-धनुष से तोप का सामना करता है, और उस सपने की झलक है जिसमें आदिवासी “अपना राज, अपना कानून” देखता है।
1857 की क्रांति से 2 साल पहले, जब पूरा भारत अंग्रेजों की “सभ्यता” के सामने सिर झुका रहा था, संथाल आदिवासियों ने “जल, जंगल, जमीन” की लड़ाई छेड़ दी थी। यह आलेख हूल दिवस के ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक और समकालीन महत्व को 8 भागों में समझेगा।
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हूल से पहले का संथाल समाज: “दामिन-ए-कोह” की दुनिया
संताल कौन थे?
संताल भारत की सबसे बड़ी आदिवासी जनजातियों में से एक हैं। इनकी आबादी आज झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार और बांग्लादेश में लगभग 1 करोड़ है। इनकी भाषा “संताली” है, लिपि “ओल चिकी” है, और धर्म “सरना” है – यानी प्रकृति पूजा। पहाड़, नदी, पेड़, सूरज – सब उनके देवता। 18वीं सदी के मध्य तक संथाल राजमहल पहाड़ी क्षेत्र और गंगा के किनारे “जंगल काटो, खेती करो” वाले स्थानांतरित कृषक थे। वे जंगल साफ करके धान, मड़ुआ, कोदो उगाते थे। उनका समाज समतावादी था। मुखिया “मांझी” होता था, पर फैसले “जाहेर” यानी गांव की सभा में होते थे।
दामिन-ए-कोह” का प्रयोग
1793 में लॉर्ड कॉर्नवालिस ने “स्थायी बंदोबस्त” लागू किया। जमींदारों को जमीन का मालिक बना दिया गया। पर राजमहल की पहाड़ियाँ इतनी दुर्गम थीं कि कोई जमींदार वहाँ जाना नहीं चाहता था।
इसलिए 1832 में ब्रिटिशों ने “दामिन-ए-कोह” यानी “पहाड़ी की सीमा” घोषित करके संथालों को वहाँ बसाया। लक्ष्य था: जंगल साफ करके खेती बढ़ाना, राजस्व बढ़ाना। ब्रिटिश अधिकारी कैप्टन शेरविल ने 40,000 संथाल परिवारों को भागलपुर से राजमहल लाकर बसाया। शुरुआत में संताल खुश थे। उन्हें जमीन मिली, जंगल मिला, आजादी मिली। पर ये “सुनहरा काल” ज्यादा दिन नहीं चला।
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शोषण की तीन धाराएँ: दिकु, महाजन और अमला
संतालों ने ब्रिटिश, जमींदार और महाजन को “दिकु” कहा – अर्थात “बाहरी लुटेरा”। शोषण 3 स्तरों पर हुआ:
आर्थिक शोषण: सूदखोरी का जाल
संताल सीधे-सादे थे। खेती के लिए बीज, बैल, हल खरीदने को महाजन से कर्ज लेते थे। महाजन 50% से 500% तक ब्याज लेता था। हिसाब-किताब बही में होता था, जो संथाल पढ़ नहीं सकते थे।
एक बार कर्ज लिया तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता था। पिता का कर्ज बेटा चुकाता था। इसे “बंधुआ मजदूरी” बना दिया गया। कर्ज न चुका पाने पर जमीन, घर, गाय-बैल सब नीलाम हो जाते थे।
जमीनी शोषण: भूमि हड़प नीति
स्थायी बंदोबस्त के तहत जमींदार लगान वसूलते थे। संथालों से फसल का 50% तक लगान लिया जाता था। लगान न देने पर पुलिस आकर मारपीट करती थी, घर जला देती थी, औरतों की इज्जत लूटती थी। “रैयती जमीन” धीरे-धीरे “जमींदारी जमीन” बन गई। संथाल अपनी ही जमीन पर बटाईदार बन गए।
प्रशासनिक शोषण: अन्याय की कचहरी
जब संताल कचहरी जाते थे न्याय मांगने, तो वहाँ भी दिकु जज बैठा था। वो महाजन-जमींदार की भाषा समझता था, संताल की नहीं। पुलिस “अमला” कहलाती थी। वो भी जमींदार के साथ मिलकर संतालों को लूटती थी।
कहावत बन गई थी: “दिकु का राज, दिकु का कानून, संथाल का खून-पसीना।”
सांस्कृतिक शोषण
महाजन संथाल महिलाओं को तुच्छ समझते थे, उनका मजाक उड़ाते थे। शराब पिलाकर ठगी करते थे। संथालों के “जाहेर थान” यानी पवित्र उपवन काटे जा रहे थे। उनकी अस्मिता पर हमला हो रहा था।
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30 जून 1855: भोगनाडीह से उठी चिंगारी
चार भाई और ईश्वरीय आदेश
भोगनाडीह गांव, परगना महल, जिला साहिबगंज। यहाँ सिद्धो, कान्हू, चांद और भैरव – चार संताल भाई रहते थे। मान्यता है कि एक रात सिदो-कान्हू को स्वप्न में “ठाकुर बोंगा” यानी सर्वोच्च देवता ने दर्शन दिए। आदेश मिला: “दिकुओं का अत्याचार बढ़ गया है। अब हथियार उठाओ। अपना राज स्थापित करो।” सिद्धो-कान्हू ने गांव-गांव संदेश भेजा: “30 जून 1855 को भोगनाडीह मैदान में इकट्ठा हो। हूल शुरू होगा।”
“हूल गुटि” की सभा
30 जून को लगभग 10,000 संथाल तीर-धनुष, टांगी, कुल्हाड़ी लेकर इकट्ठा हुए। पेड़ की डाल पर “हूल गुटि” यानी विद्रोह का झंडा गाड़ा गया। सिद्धो ने ऐलान किया: “हम अब अंग्रेज का हुकुम नहीं मानेंगे। हम अपना ‘संथाल राज’ बनाएंगे। जो दिकु जुल्म करेगा, उसे मारो। जो संथाल धोखा देगा, उसे भी मारो।” यह “स्वराज” की पहली घोषणा थी – 1857 से पहले।
हूल की रणनीति
हूल कोई अंधा विद्रोह नहीं था। इसकी योजना थी: लक्ष्य: पहले महाजन, फिर जमींदार, फिर पुलिस, फिर अंग्रेज अधिकारी।
साधन: तीर-धनुष से रात में हमला। “गुरिल्ला युद्ध”। नारा: “अपना देश, अपना राज”। संकेत: महुआ के पेड़ की शाखा, ढोल-नगाड़े की आवाज से संदेश फैलता था।
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हूल का विस्तार और ब्रिटिश दमन
*आग की तरह फैला विद्रोह जुलाई 1855 तक हूल भागलपुर, बीरभूम, मुर्शिदाबाद, मानभूम, सिंहभूम तक फैल गया। लगभग 30,000 संथाल और 400 गांव इसमें शामिल हो गए। संतालों ने 150 से ज्यादा महाजनों और जमींदारों को मार डाला। कई थाने जला दिए। रेल लाइन उखाड़ दी। ब्रिटिश अधिकारी मेजर बरो ने लिखा: “संथाल अब जंगल के शेर बन गए हैं।”
ब्रिटिश प्रतिक्रिया: “मार्शल लॉ”
अंग्रेज घबरा गए। बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर हॉलिडे ने “मार्शल लॉ” लगा दिया। सेना, तोप, बंदूकधारी सिपाही भेजे गए। नवंबर 1855 में “पाकुड़ की लड़ाई” हुई। संथाल तीर लेकर तोप के सामने खड़े हो गए। हजारों मारे गए। ब्रिटिश सैनिकों ने लिखा: “वे मरते दम तक ‘हूल जोहार’ चिल्लाते रहे।”
शहादत: सिद्धो-कान्हू की फांसी
26 जुलाई 1855 को धोखे से सिद्धो-कान्हू पकड़े गए। 2 अगस्त 1855 को भोगनाडीह में ही उन्हें पेड़ पर लटका कर फांसी दे दी गई। चांद-भैरव भी युद्ध में शहीद हो गए। पर मरवाने से पहले सिद्धो ने कहा था: “हम मर जाएंगे, पर संथाल का हूल कभी नहीं मरेगा।”कुल मिलाकर 15,000 से 20,000 संथाल शहीद हुए। यह संख्या 1857 की क्रांति से भी ज्यादा थी।
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हूल के परिणाम: हार के बाद की जीत
ब्रिटिशों ने विद्रोह तो कुचल दिया, पर डर गए। उन्हें समझ आ गया कि आदिवासी को हमेशा दबाकर नहीं रखा जा सकता।
संताल परगना टेनेंसी एक्ट 1856
विद्रोह के एक साल बाद ब्रिटिशों को “संथाल परगना टेनेंसी एक्ट” बनाना पड़ा। इसके मुख्य प्रावधान:
1. “दामिन-ए-कोह” को “संथाल परगना” नाम देकर अलग जिला बनाया गया।
2. संथाल की जमीन गैर-आदिवासी को बेचना/गिरवी रखना प्रतिबंधित।
3. महाजनों के ब्याज की दर तय की गई।
4. संथालों के लिए अलग “मांझी-परगना” पंचायती व्यवस्था मान्य की गई।
यह भारत का पहला “आदिवासी सुरक्षा कानून” था।
1857 की क्रांति की पृष्ठभूमि
इतिहासकारों का मानना है कि हूल ने 1857 की क्रांति का रास्ता तैयार किया। अंग्रेजों को लगा कि “भारत में आग सुलग रही है”। संथालों ने दिखा दिया कि किसान-आदिवासी भी संगठित होकर लड़ सकते हैं।
आदिवासी चेतना की नींव
हूल के बाद “उलगुलान” यानी बिरसा मुंडा का आंदोलन 1895 में आया। बिरसा ने खुद कहा था: “सिद्धो-कान्हू मेरे गुरु हैं।”आज भी झारखंड आंदोलन, छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट की मांग, “जल-जंगल-जमीन” का नारा – सबकी जड़ हूल में है।
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हूल दिवस का समकालीन महत्व
आज 170 साल बाद भी 30 जून को “हूल दिवस” मनाया जाता है। क्यों?
शहीदों को श्रद्धांजलि
साहिबगंज के भोगनाडीह में सिद्धो-कान्हू पार्क और शहीद स्मारक है। इस दिन लाखों आदिवासी यहाँ इकट्ठा होते हैं। पुष्पांजलि, सांस्कृतिक नृत्य “डाहार”, ढोल-मांदर की थाप। झारखंड सरकार राजकीय शोक घोषित करती है। मुख्यमंत्री शहीद वेदी पर माल्यार्पण करते हैं।
आदिवासी अस्मिता का दिन
हूल दिवस पर संथाली भाषा, ओल चिकी लिपि, सरना धर्म पर गोष्ठियाँ होती हैं। स्कूल-कॉलेज में बच्चों को बताया जाता है कि “हम गुलामों की औलाद नहीं, शहीदों की औलाद हैं।”
. वर्तमान संघर्षों से जोड़ना
आज भी आदिवासी विस्थापन, खन, जंगल कटाई, फर्जी केस से जूझ रहे हैं। हूल दिवस पर नेता और कार्यकर्ता इन मुद्दों को उठाते हैं। “पाथलगढ़ी आंदोलन”, “ग्राम सभा का अधिकार” – ये सब हूल की भावना से जुड़े हैं।
. राष्ट्रीय एकीकरण का प्रतीक
हूल सिर्फ संथाल का नहीं, पूरे भारत का इतिहास है। केंद्र सरकार ने भी अब हूल दिवस को मान्यता दी है। यह “जनजातीय गौरव दिवस” 15 नवंबर बिरसा जयंती के साथ मिलकर आदिवासी योगदान को राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाता है।
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हूल से सीख: पांच सबक 21वीं सदी के लिए
शोषण के खिलाफ संगठित प्रतिरोध: सिद्धो-कान्हू के पास बंदूक नहीं थी, पर एकता थी। आज भी अगर आदिवासी, किसान, मजदूर एकजुट हों तो नीतियाँ बदल सकती हैं।
जमीन से जुड़ाव: संथालों के लिए जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, “माँ” थी। आज जब कॉरपोरेट और खन कंपनियाँ जमीन ले रही हैं, हूल याद दिलाता है कि “विस्थापन मतलब सांस्कृतिक मृत्यु” है।
स्वशासन का मॉडल: “मांझी-परगना” व्यवस्था गांव की स्वायत्तता का मॉडल थी। संविधान की 5वीं अनुसूची और PESA कानून 1996 इसी सोच को आगे बढ़ाते हैं।
प्रकृति पूजा: संथाल “सरना धर्म” मानते थे – पेड़ काटो मत, नदी गंदी मत करो। जलवायु संकट के समय हूल का पर्यावरणीय संदेश और प्रासंगिक हो गया है।
बलिदान की परंपरा: सिद्धो-कान्हू ने परिवार, गांव, जान सब दांव पर लगा दिया। “देश पहले” की भावना हूल से ही शुरू होती है।
चुनौतियाँ और आगे का रास्ता
हूल को याद करना काफी नहीं है, उसे जीना होगा।
ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण की कमी
हूल का इतिहास ज्यादातर “मौखिक परंपरा” में है। ब्रिटिश रिकॉर्ड में इसे “Santhal Rebellion” कहा गया। संथालों के नजरिए से इसे स्कूल की किताबों में जगह मिलनी चाहिए।
आर्थिक विकास बनाम पहचान
आज झारखंड के संथाल परगना में गरीबी, पलायन, शिक्षा की कमी है। विकास चाहिए, पर वो विकास जो संथाल की जमीन, भाषा, संस्कृति को न निगले।
युवा पीढ़ी को जोड़ना
शहरों में पढ़ने वाले संथाल युवा कई बार अपनी जड़ें भूल जाते हैं। हूल दिवस पर “डिजिटल हूल” – सोशल मीडिया, पॉडकास्ट, डॉक्यूमेंट्री के जरिए युवाओं को जोड़ना जरूरी है।
महिलाओं की भूमिका
हूल में फुलो-झानो जैसी संथाल महिलाओं ने भी लड़ाई लड़ी थी। आज महिला स्व-सहायता समूह, महिला मुखिया – ये हूल की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
“हूल” खत्म नहीं हुआ, रूप बदल गया
170 साल पहले संथालों ने तीर-धनुष से हूल किया था। आज हूल का मतलब बदल गया है:
– कल हूल था महाजन के खिलाफ, आज हूल है कर्ज के जाल के खिलाफ।
– कल हूल था जमींदार के खिलाफ, आज हूल है फर्जी जमीन अधिग्रहण के खिलाफ।
– कल हूल था जंगल काटने के खिलाफ, आज हूल है जलवायु परिवर्तन के खिलाफ।
हूल दिवस हमें याद दिलाता है कि आदिवासी समाज “समस्या” नहीं है, “समाधान” है। प्रकृति के साथ जीने का, समता के साथ रहने का, अन्याय के खिलाफ खड़े होने का समाधान।
इसलिए जब 30 जून को हम “जोहार सिदो-कान्हू” बोलते हैं, तो हम सिर्फ नारा नहीं लगा रहे होते। हम अपने अंदर के उस संथाल को जगा रहे होते हैं जो कहता है: “अगर जुल्म होगा, तो हूल फिर होगा।”
*_”हूल जोहार! सिद्धो-कान्हू अमर रहें!
जल-जंगल-जमीन बचाओ! आदिवासी एकता जिंदाबाद!”


