डॉ नजरुल इस्लाम
हूल दिवस के नाम पर हर वर्ष 30 जून को हमारे अमर शहीद सिदो कान्हू की जन्मस्थली व पैतृक आवास में विगत 20 वर्षों से बरहेट भोगनाडीह में, राजकीय समारोह का आयोजन होता रहा है जिसमें राज्यपाल / मुख्यमंत्री / केंद्रीय मंत्री और राजकीय मंत्री समारोह के मुख्य अतिथि होते हैं। हूल दिवस यानी संथाली विद्रोह (क्रांति) को कहा जाता है संताल के नेतृत्व कर्ता और क्रान्तिवीर सिदो कान्हू, चांद, भैरव, फूलो-झानो के अलावे लगभग 50 हजार संताल विद्रोहियों ने अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा शोषण और अत्याचार के विरुद्ध जल, जंगल, जमीन एवं महाजनों, साहुकारों के दमन और शोषण के खिलाफ 1855 में पूरी तैयारी के साथ अंग्रेजी हुकूमत को ललकारा एवं हमला बोल दिया। आज की वर्तमान परिस्थितियों में विकास और औ?द्योगिकरण के दौर में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और इन अधिकारों का हनन के बीच इस क्रांति यानी हुल दिवस की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है।
इस दिवस यानी 1855 का वर्ष संताल विद्रोह से शुरु होकर ये प्रथम स्वतंत्रता संग्राम यानी 1857 देश में अंग्रेजों के विरुद्ध पहली स्वतंत्रता की आवाज बन देश के कोने-कोने में गूंजा कि अब भारत आजादी चाहता है -संताल विद्रोह ने भारत के अंदर लोगों में क्रांति की आवाज उठाने वालों को एक जबरदस्त अवसर मिला और फिर लगातार आगे देश आजादी की लड़ाई पूरे देश के स्तर से छिट पुट होती रही और नतीजतन महात्मा गाँधी के नेतृत्व में 1947 में भारत को आजादी मिल गई। भारत छोड़कर अंग्रेज भाग गए। संताल हुल के बदौलत ही आज हमारे संताल में SPT Act को अंग्रेजों ने लागू किया था जो आज भी बरकरार है इस Act से संथालों की जमीन को न कोई खरीद सकता है न बेच सकता है ये Non trnseble भी है। यह जमीन संबंधी मजबूत कानून सिदो कान्हू के सौजन्य से ही संथालों को मिला ताकि हम अपनी जल जंगल जमीन की रक्षा कर सकें। इसलिए निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि हुल दिवस की प्रासंगिकता आज भी बरकरार है इसलिए हर वर्ष 30 जून को हुल दिवस मनाया जाता है ताकि प्रथम स्वतंत्रता सेनानी सिदो कान्हू चाँद भैरव फूलो-झानो जैसे अमर शहीदों को नमन किया जा सके उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सके।
प्रभारी प्राचार्य
शिबू सोरेन जनजातीय डिग्री महावि बोरियो साहेबगंज


