परिचर्चा: *1855 के संताल हूल का संकल्प
खनिज से अमीर, पर रोजगार को तरसती माटी
विशेषज्ञों ने कहा- नीतियों में क्रांतिकारी बदलाव ही शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि
एस.के.झा.’सुमन’
दुमका। 30 जून 1855 को सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो के नेतृत्व में सुलगने वाली ‘हूल’ की चिंगारी सिर्फ ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जंग नहीं थी, बल्कि वह जल-जंगल-जमीन की संप्रभुता और मानवीय गरिमा का वैचारिक घोषणापत्र था। आज साल 2026 में, जब झारखंड अपनी स्थापना के ढाई दशक पूरे कर चुका है, तब संघर्ष का मैदान बदल चुका है। आज का दुश्मन सामने खड़ा कोई अंग्रेज नहीं, बल्कि व्यवस्थागत खामियां हैं। हमारी शिक्षा डिग्रियों में सिमट रही है। युवा रोजगार के लिए पलायन कर रहे हैं। सामाजिक ताने-बाने पर व्यक्तिवाद हावी है और वैश्विक चकाचौंध में हमारी सांस्कृतिक जड़ें कमजोर हो रही हैं। इस विशेष विमर्श में 8 प्रबुद्ध हस्ताक्षर इस बात को टटोल रहे हैं कि क्या आज के झारखंडी समाज को अपनी सोई हुई चेतना को जगाने के लिए एक नए वैचारिक हूल’ की जरूरत है?
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संताल परगना: गरीबी नहीं, अशिक्षा असली संकट
झारखंड में आज एक और ‘वैचारिक हूल’ (आंदोलन) की सख्त जरूरत है। संताल परगना क्षेत्र की सबसे बड़ी और गंभीर समस्या गरीबी नहीं, अशिक्षा है। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में गुणवत्ता का भारी अभाव है। विद्यालयों में बच्चों को मिड-डे मील तो मिल रहा है, लेकिन सही मायने में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल पा रही है। शिक्षा ही वह शक्ति है जो प्रगति के मार्ग खोलती है। बिना गुणात्मक शिक्षा के लोगों में वैचारिक चेतना जगाना और किसी भी प्रकार का वैचारिक आंदोलन खड़ा करना असंभव है।
डॉ. प्रमोदिनी हाँसदा, देवघर हिंदी विद्यापीठ की कुलपति
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सांस्कृतिक चेतना ही असली विकास : 1855 के हूल से लें प्रेरणा
सांस्कृतिक पहचान के बिना विकास अधूरा है” 1855 का हूल अपनी अस्मिता को बचाने की लड़ाई थी। आज हमारी संस्कृति और भाषाएं संक्रमण के दौर से गुजर रही हैं। जब तक झारखंड की प्राथमिक शिक्षा में स्थानीय भाषाओं और लोक-संस्कृति को गहराई से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक हमारी युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से कटी रहेगी। वैचारिक हूल का पहला कदम अपनी सांस्कृतिक चेतना को जगाना है।
डॉ. राजकिशोर हांसदा, जनजाति सुरक्षा मंच के सदस्य एवं राष्ट्रीय सह संयोजक
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झारखंडी समाज: वैचारिक चेतना की ज़रूरत
बदलते समाज में अधिकारों के प्रति सजगता जरूरी आज का झारखंडी समाज आंतरिक विरोधाभासों और राजनीतिक भटकाव का शिकार है। हूल का मूल मंत्र था सामूहिकता । आज व्यक्तिवाद हावी हो रहा है। समाज में जब तक विस्थापन, मानव तस्करी और डायन प्रथा जैसी कुरीतियों के खिलाफ जमीन पर वैचारिक चेतना नहीं फैलेगी, तब तक 1855 के शहीदों का सपना अधूरा रहेगा।
डॉ एस.के.झा, समाजशास्त्री
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झारखंड का अधूरा संकल्प: चेहरे बदले, पर नीति के केंद्र से गायब है ‘अंतिम व्यक्ति’
राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना वैचारिक बदलाव असंभव। झारखंड राज्य जिस उद्देश्य के लिए बना था, क्या वह पूरा हुआ? सत्ता बदलती है, लेकिन व्यवस्था नहीं बदलती। जब तक नीति निर्धारण के केंद्र में झारखंड का अंतिम व्यक्ति (गरीब, किसान, मजदूर) नहीं होगा, तब तक कोई भी बदलाव बेमानी है। नीतिगत हूल की शुरुआत राजनीतिक शुचिता से ही संभव है।
विजय सोनी, समाजसेवी, झारखंड आंदोलनकारी एवं राजनीतिक विश्लेषक
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खनिज हमारा, रोजगार क्यों पराया?
संसाधनों की प्रचुरता के बीच रोजगार का अकाल क्यों? झारखंड देश को खनिज देता है, लेकिन यहां के युवा रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर हैं। यह नीतिगत विफलता है। हमें एक ऐसी औद्योगिक और कृषि नीति की जरूरत है जो स्थानीय युवाओं को रोजगार दे। वैचारिक हूल का मतलब अब यह होना चाहिए कि हम अपने संसाधनों पर अपना आर्थिक हक मांगें।
डॉक्टर अनिल ठाकुर (वरिष्ठ अर्थशास्त्री)
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डिजिटल दौर में युवाओं को पहचाननी होगी अपनी ताकत
आज का युवा सोशल मीडिया पर सक्रिय है, लेकिन वह वैचारिक रूप से भ्रमित है। 1855 में सूचना के साधन नहीं थे, फिर भी लाखों लोग एकजुट हो गए। आज सब कुछ होते हुए भी हम बिखरे हुए हैं। युवाओं को रील्स और सतही विमर्श से बाहर निकलकर राज्य के वास्तविक मुद्दों जैसे स्थानीयता, नियोजन और शिक्षा पर तार्किक बहस शुरू करनी होगी।
डॉ श्याम देव हेंब्रम, अध्यक्ष, छात्र समन्वय समिति, एसकेएमयू
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बौद्धिक हूल: बदलते झारखंड में आदिवासी अस्मिता और विकास की नई राह
1855 का संताल हूल केवल अंग्रेजों के खिलाफ हथियारबंद जंग नहीं था। यह जल, जंगल, जमीन और आत्मसम्मान की रक्षा का महासंकल्प था। आज 2026 में झारखंड के सामने विस्थापन, बेरोजगारी और सांस्कृतिक पहचान खोने जैसी गंभीर चुनौतियाँ हैं। इन परिस्थितियों से निपटने के लिए अब तीर-धनुष की नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा, जागरुकता और संवैधानिक अधिकारों के प्रति सजगता की आवश्यकता है। सिदो-कान्हू के सपनों का झारखंड तभी साकार होगा जब युवा बौद्धिक रूप से सशक्त होंगे। आज हमें एकजुट होकर कुरीतियों और शोषण के खिलाफ एक नया ‘वैचारिक हूल’ फूंकना होगा, ताकि आदिवासी अस्मिता और आधुनिक विकास दोनों साथ चल सकें।
सुलेमान मरांडी, मीडिया प्रभारी, गोटा भारोत सिदो कान्हू हूल बैसी
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जागो वीर के वंशजों: नशा छोड़ो, अधिकार पहचानो
1855 के संताल विद्रोह में सिदो और कान्हू ने ‘आबोवाक् दिसोम, आबोवाक् राज’ का सपना देखा था अर्थात हमारा देश, हमारा शासन। आज झारखंड राज्य बनने के बावजूद आदिवासी समाज जल, जंगल, जमीन और अधिकारों के सवाल पर अब भी संघर्षरत है। योजनाएँ बनती हैं, पर ज़मीन पर नहीं उतरतीं। शिक्षा की कमी और नशाखोरी समाज को कमजोर कर रही है। यदि आदिवासी समाज को शोषण से मुक्त होना है, तो चेतना, शिक्षा और आत्मसंघर्ष का नया हूल खड़ा करना होगा, तभी सिदो-कान्हू का सपना पूरा होगा।
डॉक्टर सुशील टुड,सहायक प्राध्यापक, संताली विभाग,
सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय दुमका
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