डॉ. सुमन कुमार
ऐतिहासिक संताल हूल (1855) के महान नायकों सिदो मुर्मू और कान्हू मुर्मू की जयंती 11 अप्रैल को मनाई जाती है। क्रांति के महानायक सिदो मुर्मू का जन्म 11 अप्रैल 1815 को साहिबगंज जिला के भोगनाडीह गांव में हुआ था। सिदो के छोटे भाई का जन्म लगभग 1820 के आसपास हुआ था। उनकी सटीक जन्मतिथि ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज नहीं है। इसलिए उनकी जयंती भी सिदो मुर्मू की जयंती के साथ ही 11 अप्रैल को ही संयुक्त रूप से मनाया जाता है। संताल परगना सहित पूरे झारखंड में इस दिन को सिदो-कान्हू जयंती या छठीहार महा के रूप में बड़े उत्साह से मनाया जाता है।
सिदो मुर्मू अपने भाइयों कान्हू मुर्मू, चांद मुर्मू, भैरव मुर्मू और दोनों बहनों फूलो-झानो के साथ मिलकर 30 जून 1855 को जो ‘हूल’ (विद्रोह) किया, वह ब्रिटिश शासन, महाजनों और जमींदारों जमींदारों के खिलाफ भारत के सबसे बड़े जनजातीय आंदोलनों में से एक था।
संताल हूल को अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम विद्रोह भी कहा जाता है। आज उनकी जयंती पर न सिर्फ संताल परगना में बल्कि पूरे झारखंड में समारोह आयोजित कर महानायकों के योगदान को याद किया जाता है। भोगनाडीह में विशेष रूप से पूजा-अर्चना, सांस्कृतिक कार्यक्रम और स्मृति सभा की जाती है। आज उनकी जयंती पर हमारे मन में स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि संताल हूल के महानायक सिदो-कान्हू ने जो सपना देखा था वह कितना पूरा हुआ? क्या संताल हूल का मकसद हासिल हो सका?
सिदो कान्हु ने ‘दिकू’ (बाहरी शोषक- ब्रिटिश, जमींदार, महाजन) के खिलाफ 60,000 से अधिक संथालों को एकजुट किया। संताल हूल का मुख्य उद्देश्य था- जल, जंगल, जमीन पर संथालों का स्वामित्व, शोषणमुक्त समाज और ‘अबुआ राज’ (हमारा अपना राज)। ब्रिटिश राजस्व नीति, सूदखोरी, जबरन भूमि हड़पने और संस्कृति पर हस्तक्षेप के विरुद्ध यह क्रांति हुई थी। संताल हूल के दमन में 15,000 से अधिक आंदोलनकारी संताल शहीद हुए, गांव के गांव जला दिए गए। अंग्रेजों के सैन्य शक्ति के बल पर हूल को दबा दिया पर ब्रिटिश शासकों को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि आदिवासी असंतोष अगर जारी रहा तो यहां अंग्रेजी राज चलाना आसान नहीं होगा। यह संताल हूल का ही परिणाम था कि जल, जंगल और जमीन पर जनजातीय समाज के अधिकारों को संरक्षित करने के लिए एसपीटी एक्ट जैसा कानून बनाया गया। आज सिदो कान्हु की जयंती पर अगर उनके सपनों के पूरा होने अथवा नहीं होने का अगर हम विश्लेषण करें तो इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि उनका सपना अधूरा नहीं नहीं है पर आंशिक रूप में ही सपना पूरा हुआ है।
हूल का सबसे बड़ा परिणाम 1876 का संताल परगना टेनेंसी एक्ट था जो आज भी लागू है। इस कानून ने आदिवासी भूमि हस्तांतरण पर रोक लगा दी गई। न सिर्फ गैर-आदिवासियों को बल्कि आदिवासी भी एक-दूसरे को जमीन नहीं बेच सकते। संथालों को स्वशासन का अधिकार दिया। बाद में छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट (1908) और पांचवीं अनुसूची जैसी संवैधानिक व्यवस्थाएं भी हूल की देन कही जा सकती हैं। स्वतंत्र भारत में इन कानूनों ने संथालों को बहुत हद तक सुरक्षा दी।
आदिवासी समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है। 1947 में देश के आजाद होने से पहले ही आदिवासियों ने अलग झारखंड राज्य की उठायी जो आगे चल कर झारखंड आंदोलन के रूप में उभरा। परिणाम स्वरूप वर्ष 2000 में अंततः झारखंड अलग राज्य का गठन हुआ। झारखंड राज्य के गठन के बाद सिदो-कान्हु की धरती संताल परगना का तेजी से विकास हुआ और राज्य की राजनीति में संताल परगना का दबदबा बढ़ा। इसका परिणाम भी दिखा। शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा, सड़क, बिजली-पानी और आधारभूत संरचनाओं पर कई महत्वपूर्ण कार्य संताल परगना में हुए जो दशकों से उपेक्षित था। आज संथाल समाज के बेटे-बेटियां सरकारी नौकरियों, राजनीति और व्यवसाय में आगे बढ़ रहे हैं।
आज भी सिदो-कान्हु का सपना अधूरा रहने के कई कारण हैं। आदिवासियों का सबसे बड़ा मुद्दा जल, जंगल और जमीन के संरक्षण का सवाल आज भी खड़ा है। SPT एक्ट के लागू रहने के बावजूद संथाल परगना में जमीन विवाद चरम पर हैं। 1932 के जमीन बंदोबस्ती के बाद पुनःसर्वेक्षण आज तक पूर्ण नहीं हो सका। कई गांवों में जमीन का दाखिल-खारिज का विवाद है। जमीन सर्वे का काम पूरा नहीं होने के कारण कई तरह की समस्याओं से लोगों को रोज जूझना पड़ रहा है। बड़े पैमाने पर आदिवासियों की जमीनें हड़प ली गई है। दिशोम गुरु शिबू सोरेन के नेतृत्व में हुए झारखंड आंदोलन का एक प्रमुख मुद्दा था कि राज्य अलग होने पर पूर्व में संतालों की हड़पी हुई जमीन वापस दिलाई जाएगी। झारखंड बनने के 25 साल बाद भी आदिवासियों को उनकी हड़पी हुई जमीनें वापस नहीं मिली। उल्टे आदिवासियों की जमीन पर अवैध कब्जे की शिकायतें लगातार सामने आती रहती हैं। बड़े प्रोजेक्ट्स और विकास के नाम पर खनन, उद्योग और सड़क-रेल परियोजनाओं के लिए व्यापक पैमाने पर आदिवासियों को अपनी जमीन से उजड़ने को बाध्य होना पड़ा। विस्थापन झारखंड की बहुत बड़ी समस्या है। रोजी-रोजगार की तलाश में झारखंड के आदिवासियों का पलायन जगजाहिर है।
सिदो और कान्हु मुर्मू ने जिस शोषण विहीन ‘अबुआ राज’ की परिकल्पना की थी वह अभी पूरा नहीं हो सका है। झारखंड में बाहरी ठेकेदारों, बिचौलियों और कई भ्रष्ट नौकरशाहों की सक्रियता से आदिवासियों का शोषण हो रहा है। बेरोजगारी और पलायन उनकी नियति बन चुकी है। य सांस्कृतिक रूप से भी देखें तो सरना धर्म को अलग कोड की मांग लंबे समय से लंबित है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रगति के बावजूद संताल परगना के सुदूर गांवों में स्थिति बहुत नहीं सुधरी है। गरीबी और असमानता बनी हुई है। संतालों के जीवन का आधार रहे जंगल भी सिमटते जा रहे हैं।
निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि आज भी जल-जंगल-जमीन पर अधिकार के सवाल पर संताल समाज आज भी संघर्ष कर रहा है।
खुशी की बात है कि हेमंत सोरेन की सरकार ने पेसा कानून को लागू कर दिया है। इस कानून के लागू हो जाने से संतालों को ग्राम सभा के माध्यम से स्वशासन का अधिकार मिल गया है। पर नौकरशाही से त्रस्त इस राज्य में पेसा कानून का प्रभावी क्रियान्वयन एक बड़ी चुनौती है। आज यह संकल्प लेने का दिन है कि अपने अधिकार और स्वाभिमान की रक्षा के लिए हमारे महानायकों सिदो और कान्हु मुर्मू ने एकजुटता और संघर्ष की जो अलख जगाई थी, उसे तब तक न बुझने दें जब तक ‘अबुआ राज’ का सपना पूरी तरह साकार न हो जाए।
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