●पेसा कानून के साथ लोकतंत्र की जड़ों तक पहुंचने का समय
●संघर्ष से उपजा लोकतांत्रिक स्वाभिमान की धरती है संताल परगना
डॉ.सुमन कुमार
दुमका । आज हमारा देश गणतंत्र दिवस समारोह मना रहा है।गणतंत्र दिवस केवल राष्ट्रीय ध्वज फहराने का दिन नहीं है।यह दिन हमें संविधान की आत्मा को परखने का भी अवसर देता है। यह आत्मा क्या है- जनता की भागीदारी, सामाजिक न्याय, समानता और स्थानीय स्वायत्तता। यदि इन मूल्यों को जमीन पर देखना हो, तो झारखंड का संताल परगना क्षेत्र एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आता है। इतिहास, संस्कृति और अब पेसा कानून के माध्यम से उभरती स्वशासन व्यवस्था, इस संताल परगना क्षेत्र को भारतीय गणतंत्र की गहरी जड़ों से जोड़ती है।
संताल परगना की धरती ने 1855 के ऐतिहासिक संताल हूल के रूप में अंग्रेजी शासन के अन्याय के खिलाफ जो आवाज उठाई, वह केवल विद्रोह नहीं था।वह स्वशासन और गरिमा की घोषणा थी। सिदो, कान्हू, चांद, भैरव और फूलो-झानो जैसे वीरों का संघर्ष इस बात का प्रतीक था कि स्थानीय समाज अपने संसाधनों और जीवन पद्धति पर बाहरी नियंत्रण स्वीकार नहीं करेगा।
आज जब हम संविधान की प्रस्तावना में “हम भारत के लोग” पढ़ते हैं, तो यह वाक्य संताल परगना के इतिहास में जीवंत दिखाई देता है। यहां लोकतंत्र कोई आयातित व्यवस्था नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन का पारंपरिक हिस्सा रहा है। संताल परगना की सामाजिक संरचना प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व पर आधारित है। जल, जंगल और जमीन यहाँ अर्थव्यवस्था ही नहीं, पहचान का आधार हैं। यही कारण है कि संविधान की पंचम अनुसूची आदिवासी बहुल क्षेत्रों को विशेष संरक्षण देती है।लेकिन लंबे समय तक नीतियों और योजनाओं में स्थानीय समुदाय की वास्तविक भागीदारी सीमित रही। विकास अक्सर ऊपर से थोपे गए ढाँचे की तरह दिखा, जिससे विस्थापन, असंतोष और सांस्कृतिक क्षरण की समस्याएँ उभरीं।
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पेसा कानून: गणतंत्र को गाँव तक ले जाने की कोशिश
ऐसे परिदृश्य में पेसा (PESA) कानून की प्रासंगिकता अत्यंत बढ़ जाती है। यह कानून अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को निर्णय की मूल इकाई मानता है। इसका उद्देश्य है- विकास, संसाधन प्रबंधन और सामाजिक व्यवस्था में अंतिम शक्ति स्थानीय समुदाय के हाथों में देना।
इस दृष्टि से पेसा, संविधान के 73वें संशोधन की भावना का विस्तार है। लोकतंत्र को संसद से पंचायत और पंचायत से ग्रामसभा तक पहुँचाने का प्रयास।
संताल परगना जैसे क्षेत्र में पेसा का प्रभाव कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है:
● ग्राम सभा की सहमति के बिना भूमि अधिग्रहण या बड़े परियोजनाएँ संभव नहीं होंगी। इससे विकास और अधिकारों के बीच संतुलन बनेगा।
● लघु वनोपज, जल स्रोत और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में स्थानीय लोगों की भूमिका बढ़ेगी, जिससे आजीविका और पर्यावरण दोनों सुरक्षित होंगे।
●परंपरागत सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों को वैधानिक मान्यता मिलने से पहचान और आत्मसम्मान मजबूत होगा।
●योजनाओं के क्रियान्वयन और निगरानी में ग्राम सभा की भागीदारी भ्रष्टाचार को कम कर सकती है और योजनाओं को वास्तविक जरूरतों से जोड़ सकती है।
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विकास की बदलती तस्वीर
संताल परगना आज बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है। देवघर का उभरता शैक्षणिक और स्वास्थ्य केंद्र,अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, साहिबगंज का जलमार्ग संपर्क, दुमका का उपराजधानी के रूल में प्रशासनिक विस्तार, और पर्यटन स्थलों का विकास -ये सब क्षेत्र को राष्ट्रीय मुख्यधारा से जोड़ रहे हैं।पर असली प्रश्न यह है कि क्या यह विकास स्थानीय समाज की सहमति और भागीदारी से हो रहा है? पेसा इसी सवाल का उत्तर देता है।विकास तभी सार्थक है जब वह लोगों की इच्छा और आवश्यकता से जुड़ा हो।
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प्रमुख चुनौतियां: कानून से ज्यादा जरूरी भावना
किसी भी कानून की सफलता उसके कागज़ पर लिखे प्रावधानों से नहीं, बल्कि उसके लागू होने की भावना से तय होती है। पेसा के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रशासनिक इच्छाशक्ति, जनजागरूकता और ग्राम सभाओं की क्षमता निर्माण आवश्यक है।
यदि ग्राम सभाएँ केवल औपचारिक संस्था बनकर रह गईं, तो कानून का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। लेकिन यदि उन्हें वास्तविक अधिकार, प्रशिक्षण और संसाधन मिले, तो यह क्षेत्र आत्मनिर्भर और सहभागी विकास का मॉडल बन सकता है।
गणतंत्र दिवस हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि निर्णय लेने में लोगों की सीधी भागीदारी है। संताल परगना की धरती आज हमें यही सिखा रही है-संघर्ष से स्वाभिमान, संस्कृति से पहचान और पेसा से स्वशासन।यदि यह व्यवस्था सशक्त हुई, तो संताल परगना केवल इतिहास की वीरगाथा नहीं रहेगा, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की दिशा भी तय करेगा।
इस गणतंत्र दिवस पर संकल्प यही हो – संविधान की शक्ति गाँव की चौपाल तक पहुँचे, और संताल परगना की ग्राम सभाएँ गणतंत्र की सच्ची धड़कन बनें।


