डॉ संजय कुमार झा
स्नातकोत्तर समाजशास्त्र विभाग, कोल्हान विश्वविद्यालय, चाईबासा
वर्तमान में न सिर्फ भारत में बल्कि विश्व के कई देशों में विश्व आदिवासी दिवस, 9 अगस्त,2024 को मनाया जा रहा है। विदित हो कि आदिवासी को अन्य नामों यथा-जनजाति,आदिम जाति,वन्यजाति, गिरिजन,पिछड़े हिंदू आदि से संबोधित किया गया है। जबकि भारतीय संविधान में आदिवासियों को “अनुसूचित जनजाति” कहकर संबोधित किया गया है।दरअसल ” जनजाति या आदिवासी एक ऐसा अन्तर्विवाही क्षेत्रीय समूह है जिसके सदस्य सामान्य भूभाग , भाषा, संस्कृति,जीवन स्तर, धर्म तथा व्यवसाय के आधार पर समानता की भावना द्वारा संगठित रहते हैं।”भारत में जनगणना रिपोर्ट,2011 के अनुसार कुल आबादी का 8.6त्न आदिवासी है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद -342 के तहत उन जनजातियों की एक सूची तैयार की गई है जो चार सूचकों को पूरा करती है।भारत में 75 आदिम जनजाति तथा 635 प्रकार की जनजातियां विद्यमान है। भारत के अधिकांश जनजातियां उत्तरी तथा उत्तरी पूर्वी क्षेत्र, मध्य क्षेत्र तथा दक्षिणी क्षेत्रों में निवास करती है तथा द्रविड़ भाषा, आस्ट्रिक भाषा एवं चीनी तिब्बती भाषा परिवार से संबंधित है।जिनकी मुख्य पेशा शिकार करना, खाद्य पदार्थों का संग्रह करना, पशुपालन करना, खेती करना तथा विभिन्न उद्योगों और दस्तकारियों द्वारा जीविकोपार्जन करना है। आज भी कुछ अपवादों को छोड़कर आदिवासी समुदाय अभावग्रस्त जीवन, ऋणग्रस्तता का शिकार, बेरोजगारी की समस्या,मद्यपान की समस्या, निरक्षरता, सांस्कृतिक संपर्क की समस्याएं, अंधविश्वास जैसे समस्याओं से जुझ रहा है।जब देश अमृत महोत्सव मना रहा हो ,और उस काल में भी आदिवासी समुदाय अनगिनत समस्याओं का सामना कर रहा हो तब विश्व आदिवासी दिवस की प्रासंगिकता पर विचार विमर्श होना लाजिमी है। विदित हो कि 23 दिसंबर,1994 ई0 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव संख्या 49/214 द्वारा 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रुप में घोषित किया गया।जिनका मुख्य उद्देश्य विश्व की जनजातीय आबादी के अधिकारों की रक्षा करना है। वहीं इस वर्ष,2024 में मुख्य थीम ” स्व निर्णय के लिए परिवर्तन के एजेंट के रुप में स्वदेशी युवा”है।विश्व में भारतीय लोकतंत्र एक ऐसा लोकतंत्र है जहां सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जाती है। इतना ही नहीं भारतीय संविधान में आदिवासियों के लिए विशेष प्रावधान किया गया है,वह भी 1990 के दशक में नहीं बल्कि 26 जनवरी,1950 से ही। फिर इनके अधिकारों की रक्षा करने के बजाय वर्तमान काल में आदिवासी समुदाय के विभिन्न समस्याओं का निदान करते हुए प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत होना चाहिए।प्रति वर्ष इन आदिवासी समुदायों का सिर्फ एक – एक समस्या का समाधान हुआ रहता तो आजादी के बाद से अब तक में अमूमन 75 समस्याओं का समाधान हो गया रहता तथा अंतिम छोर पर खड़े आदिवासी समुदाय तक विकास की रोशनी पहुंची रहती?। सच तो ये है कि कहीं न कहीं समस्याओं का निदान करने हेतु बनाई की नीति में ही कई त्रुटियां रह जाती है। उदाहरण स्वरुप अगर सभी स्नातक व स्नातकोत्तर विद्यार्थियों को पांच पांच निरक्षरों को साक्षर बनाने की जिम्मेदारी अध्ययन काल में ही सौंपा जाता तो न सिर्फ आदिवासी समुदाय की बल्कि पूरे भारत एक से दो वर्षों में साक्षर हो गया रहता। भारतीय लोकतंत्र एक ऐसी लोकतंत्र है जहां जब शिशु गर्भ में आता है तब से लेकर, जन्म, शैशवास्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था से लेकर अंतिम संस्कार तक के लिए कई योजनाएं बनी है।क्या ये सभी योजनाएं अंतिम छोर पर खड़े व्यक्तियों तक पहुंच पाती है,शायद नहीं।अगर ये सभी योजनाएं अभिसरण (ष्टशठ्ठ1द्गह्म्द्दद्गठ्ठष्द्ग)के साथ आदिवासी समुदाय तक पहुंच जाय तब तो विश्व आदिवासी दिवस मनाने की सार्थकता सिद्ध हो सकती है,वरना 21 वीं सदी के तृतीय दशक में भी हाशिए पर ही नजर आयेंगे।


