नई दिल्ली । भारत में आए दिन होने वाले परीक्षा पेपर लीक लाखों छात्रों के भविष्य को अंधकारमय बना रहे हैं, जबकि सरकारें लगातार नए और सख्त कानून बना रही हैं। सवाल उठता है कि ये एंटी-पेपर लीक कानून केवल कागजों पर क्यों रह जाते हैं और धरातल पर इनकी प्रभावशीलता शून्य क्यों है? विशेषज्ञ और उच्च-स्तरीय कमेटियां मानते हैं कि समस्या कानूनों में नहीं, बल्कि हमारी पूरी परीक्षा प्रणाली की कमजोरियों में निहित है। देश में राजस्थान और उत्तराखंड जैसे राज्यों ने गैर-जमानती धाराओं और संपत्ति कुर्क करने तक के कठोर कानून बनाए हैं। केंद्र ने भी हाल ही में पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, 2024 लागू किया है, जिसमें 10 साल की जेल और 1 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। बावजूद इसके, ये कड़े कानून पर्चा लीक माफिया में रत्ती भर भी खौफ पैदा करने में नाकाम रहे हैं और परीक्षाओं में गड़बड़ी की खबरें बेरोकटोक जारी हैं।
इस विफलता की मुख्य जड़ परीक्षा प्रक्रिया का व्यापक आउटसोर्सिंग है। सरकारी संस्थाओं के पास अपना इंफ्रास्ट्रक्चर न होने से परीक्षा कराने का जिम्मा निजी वेंडर्स, कंप्यूटर लैब्स और प्रिंटिंग प्रेस को सौंपा जाता है, जो सेंधमारी का सबसे कमजोर केंद्र है। इसरो के पूर्व प्रमुख डॉ. के. राधाकृष्णन की कमेटी ने भी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) के पुनर्गठन और प्राइवेट वेंडर्स पर निर्भरता खत्म करने का सुझाव दिया था। इसके अलावा, दोषियों को सजा मिलने में सालों की देरी और कम कनविक्शन रेट भी अपराधियों के मन से कानून का डर खत्म करता है। अरबों रुपये के इस खेल में राजनीतिक संरक्षण प्राप्त कोचिंग सिंडिकेट और सामाजिक दबाव भी अहम भूमिका निभाते हैं।
विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि केवल कानून बनाने से नहीं, बल्कि सिस्टम में आमूल-चूल परिवर्तन से ही बदलाव आएगा। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मनोज सिन्हा और फोरम ऑफ एकेडेमिक्स फॉर सोशल जस्टिस के डॉ. हंसराज सुमन जोर देते हैं कि आउटसोर्सिंग बंद कर सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करना और फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाकर 6 महीने के भीतर सजा सुनाना ही एकमात्र उपाय है। शिक्षाविद् डॉ. ज्योति अरोड़ा के अनुसार, सीबीएसई की तरह एन्क्रिप्टेड डिजिटल प्रश्नपत्रों का उपयोग, बायोमीट्रिक और रियल-टाइम सीसीटीवी मॉनिटरिंग तथा नो-ह्यूमन-टच मॉडल ही लीक-प्रूफ परीक्षा प्रणाली का आधार होना चाहिए।
यह स्पष्ट है कि केवल कानून की किताबें मोटी करने से पेपर लीक नहीं रुकेंगे। जब तक सरकारी एजेंसियां आउटसोर्सिंग का मोह छोड़कर स्वयं का मजबूत इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं बनाएंगी, तकनीक का सही इस्तेमाल नहीं करेंगी और त्वरित न्याय प्रणाली लागू नहीं करेंगी, तब तक एंटी-पेपर लीक कानून फाइलों में धूल खाते रहेंगे और देश के युवाओं का भविष्य यूं ही दांव पर लगा रहेगा।


