चीन से मिले हथियारों और आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियों से सुरक्षा कर रहा मजबूत
नई दिल्ली । ब्रह्मोस, स्कैल्प और रैंपेज जैसी मिसाइलों की मौजूदगी ने भारत की मारक क्षमता को मजबूत किया है। इस चुनौती से निपटने के लिए पाकिस्तान चीन से मिले हथियारों और आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियों पर निर्भरता बढ़ा रहा है। हालांकि, उसकी नई रणनीति कितनी कारगर होगी, यह वास्तविक युद्ध परिस्थितियों और दोनों देशों की तकनीकी क्षमताओं पर निर्भर करेगा। भारत की स्टैंडऑफ रणनीति का उद्देश्य अपने लड़ाकू विमानों को दुश्मन की वायु रक्षा प्रणालियों के सीधे निशाने से दूर रखते हुए हमला करने में सक्षम बनाना है।
भारत की इस क्षमता का मुकाबला करने के लिए पाकिस्तान ने तीन प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया है। पहली रणनीति चीन से प्राप्त एचक्यू-9पी और एचक्यू-16 जैसी वायु रक्षा प्रणालियों के जरिए अहम सैन्य ठिकानों और प्रतिष्ठानों की सुरक्षा मजबूत करना है। इन प्रणालियों का उद्देश्य हवाई खतरों का पता लगाकर उन्हें रोकने की क्षमता बढ़ाना है। हालांकि, किसी मिसाइल को रोकने की सफलता रडार की क्षमता, लक्ष्य की दूरी और परिस्थितियों समेत कई कारकों पर निर्भर करती है।
दूसरी रणनीति लड़ाकू विमानों और हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों को मजबूत करना है। पाकिस्तान के जे-10सीई और जेएफ-17 ब्लॉक-3 लड़ाकू विमानों के साथ चीन की पीएल-15ई मिसाइलें उसकी हवाई युद्ध क्षमता का हिस्सा हैं। इन हथियारों के जरिए पाकिस्तान भारतीय विमानों को दूरी से चुनौती देने की कोशिश कर सकता है। तीसरा क्षेत्र इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और निगरानी प्रणालियों का है। हवाई निगरानी विमानों, रडार और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग तकनीक के जरिए आने वाले खतरों की पहचान करने और कुछ मार्गदर्शन प्रणालियों को बाधित करने की क्षमता विकसित करना इसका उद्देश्य है। हालांकि, सभी मिसाइलों को जैमिंग से प्रभावित नहीं किया जा सकता।
पाकिस्तान की इन तैयारियों के सामने आर्थिक संसाधनों और विदेशी तकनीक पर निर्भरता जैसी चुनौतियां भी हैं। अत्याधुनिक वायु रक्षा प्रणालियों के रखरखाव, प्रशिक्षण और लगातार उन्नयन पर भारी खर्च होता है। दूसरी ओर, ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों को रोकना भी वायु रक्षा प्रणालियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। फिर भी किसी एक हथियार की गति या मारक दूरी के आधार पर युद्ध का परिणाम तय नहीं किया जा सकता। भारत और पाकिस्तान के बीच हवाई शक्ति का संतुलन दोनों देशों की निगरानी क्षमता, हथियारों के समन्वय, प्रशिक्षण और वास्तविक युद्ध परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।


