दावा- टीएमसी के 20 सांसद बीजेपी के संपर्क में, पार्टी और चुनाव चिह्न बचाने की चुनौती बढ़ी
नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी की राजनीतिक मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। पहले पार्टी के भीतर विधायकों की बगावत ने संगठन को झटका दिया था, वहीं अब सांसदों के स्तर पर भी असंतोष सामने आने की चर्चा तेज हो गई है। सूत्रों की मानें तो टीएमसी के करीब 20 सांसद भाजपा के संपर्क में हैं और पार्टी छोड़ने की संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं। ममता ने चुनाव में जो घोषणा की थी कि बंगाल ही नहीं दिल्ली से भी मोदी सरकार को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा अब वही दांव उन पर भारी पड़ रहा है। भाजपा शीर्ष नेतृत्व बंगाल चुनाव जीतने के साथ ही आर-पार के मूड में आ गई है। अब टीएमसी के सांसद भाजपा के संपर्क में होने का दाव कर रहे सूत्रों का कहना है, कि इन सांसदों और भाजपा नेतृत्व के बीच उच्च स्तर पर बातचीत चल रही है। बताया जा रहा है कि कुछ सांसदों ने टीएमसी से अलग होकर भाजपा में शामिल होने की इच्छा भी जताई है। यदि यह घटनाक्रम आगे बढ़ता है तो ममता बनर्जी को केवल राज्य की राजनीति में ही नहीं, बल्कि संसद में भी बड़ा झटका लग सकता है।
टीएमसी के हैं कुल 41 सांसद
वर्तमान में संसद में टीएमसी के कुल 41 सांसद हैं, जिनमें लोकसभा के 28 और राज्यसभा के 13 सदस्य शामिल हैं। विपक्षी गठबंधन की राजनीति में टीएमसी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है और संसद में यह विपक्षी दलों की प्रमुख ताकतों में से एक मानी जाती है। ऐसे में सांसदों की संभावित टूट विपक्षी खेमे के लिए भी चिंता का विषय बन सकती है।
बागी विधायकों से लग चुका है झटका
इससे पहले पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी टीएमसी को बड़ा झटका लग चुका है। पार्टी के 60 बागी विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुन लिया था, जिसे विधानसभा अध्यक्ष की मंजूरी भी मिल चुकी है। बागी गुट ने खुद को “असली तृणमूल” बताते हुए संगठन पर अपना दावा भी ठोका है।
आरोपों से घिरा पार्टी नेतृत्व
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी हार के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व, भ्रष्टाचार के आरोपों और चर्चित आरजी कर मामले को लेकर असंतोष बढ़ा है। कई नेता खुलकर सरकार और पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठा चुके हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक आने वाले दिनों में लोकसभा और राज्यसभा में भी और टूट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। इस बीच ममता बनर्जी का ध्यान पार्टी की एकजुटता बनाए रखने के साथ-साथ उसके नाम और चुनाव चिह्न को सुरक्षित रखने पर केंद्रित बताया जा रहा है। लगातार बढ़ते दबाव के बीच टीएमसी नेतृत्व संगठन पर अपनी पकड़ मजबूत रखने की कोशिश में जुटा हुआ है।


