नई दिल्ली । सोचिए, आसमान में रोज दिखने वाला चांद अचानक पहले से 14 प्रतिशत बड़ा और 30 प्रतिशत ज्यादा चमकदार हो जाए, तब कैसा नजारा होगा? क्या यह कोई जादू है… नहीं! दरअसल, यह प्रकृति का एक अद्भुत खेल है इस हम सुपरमून कहते हैं।
क्या है सुपरमून?
चांद की पृथ्वी के चारों ओर घूमने की कक्षा पूरी तरह गोल नहीं होती, बल्कि अंडाकार होती है। इसकारण कभी-कभी चांद पृथ्वी के थोड़ा करीब आता है और कभी थोड़ा दूर जाता है। जब यही चांद अपने सबसे नजदीकी बिंदु पर रहते हुए पूरा दिखाई देता है, तब “सुपरमून” कहा जाता है।
नवंबर का यह सुपरमून इस साल का दूसरा सुपरमून है, लेकिन खास बात यह है कि यह सबसे नजदीकी भी होगा। जी हां, इस दौरान चांद पृथ्वी से महज 3,57,000 किलोमीटर (करीब 2,22,000 मील) की दूरी पर रहेगा, जो पूरे साल में सबसे कम दूरी है। खगोल वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस बार का सुपरमून 5 नवंबर की शाम अपने पूरे शबाब पर होगा।
जब चांद पृथ्वी के ज्यादा करीब होता है, तब चांद का गुरुत्वाकर्षण बल थोड़ा और बढ़ जाता है। इसकारण महासागरों और समुद्रों में ज्वार-भाटा यानी टाइस सामान्य से कुछ ऊंचे हो सकते हैं। हालांकि, वैज्ञानिकों के अनुसार यह अंतर बहुत मामूली होता है और आम लोग आसानी से महसूस नहीं कर पाते।
इस शानदार खगोलीय दृश्य को देखने के लिए किसी टेलिस्कोप या खास टूल की जरूरत नहीं है। बस आसमान साफ हो और आप किसी ऐसी जगह हों जहां शहर की रोशनी कम हो, तब चांद अपनी पूरी चमक के साथ नजर आएगा।
क्यों कहलाता है ‘बीवर मून’?
हर पूर्णिमा का एक पारंपरिक नाम होता है। नवंबर की पूर्णिमा को ‘बीवर मून’ कहते है। कहा जाता है कि यह नाम उत्तर अमेरिका की एक पुरानी परंपरा से जुड़ा है, जब इस मौसम में लोग सर्दी से पहले बीवर (एक प्रकार का जानवर) के फर के लिए जाल लगाते थे। इसलिए नवंबर की पूर्णिमा को ‘बीवर मून’ कहा गया।
इस साल एक सुपरमून 7 अक्टूबर को नजर आया था, और अगला सुपरमून 4 दिसंबर, 2025 को देखने को मिलेगा। दिसंबर का यह सुपरमून इस साल का आखिरी सुपरमून होगा। अक्टूबर में हुए सुपरमून को उसके मौसम के कारण हार्वेस्ट मून कहा गया था, जबकि नवंबर में होने वाले सुपरमून को बीवर मून कहा जाएगा।
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