राज्य और राजनीति
चंदन मिश्र
झारखंड में राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी उफान पर है। चुनावी मैदान में उतरे तीन खिलाड़ियों में सत्तारूढ़ झामुमो बहुत इत्मीनान है। कांग्रेस सबसे ज्यादा परेशान है। निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवाणी के लिए चुनाव एक इम्तिहान है। नामांकन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। नामांकन पत्रों की जांच के दौरान कांग्रेस और भाजपा नेताओं के बीच काफी नोक-झोंक भी हुई। कांग्रेस को निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवाणी के नामांकन पत्र में कुछ त्रुटियां नजर आयीं और रिटर्निंग ऑफिसर से इसकी शिकायत की। हालांकि परिमल नथवाणी ने इन त्रुटियों को जांच के क्रम में ही स्पष्ट कर दिया। फिर भी जांच के दौरान विधानसभा परिसर में कांग्रेस के विधायकों और मंत्रियों ने खूब बवाल काटा। दूसरी ओर भाजपा के नेताओं-कार्यकर्ताओं ने भी हंगामा किया।
झामुमो, कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवारों के नामांकन पत्रों को लंबी जांच प्रकिया, बहस और हंगामे के बाद वैध घोषित किया गया। राज्यसभा की दो सीटों के लिए 18 जून को वोट डाले जाएंगे। तीन उम्मीदवारों और खासकर निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवाणी के चुनाव मैदान में आने के बाद राज्यसभा का चुनाव बेहद दिलचस्प और रोमांचक हो गया है। निर्दलीय उम्मीदवार
परिमल नाथवाणी का चुनाव मैदान में उतरना बेहद चर्चित राजनीतिक घटनाक्रम बन चुका है। झारखंड(रांची) आने के तुरंत बाद परिमल नथवाणी ने सबसे पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से उनके आवास पर मुलाकात की। नथवाणी लगभग दो घंटे तक मुख्यमंत्री के साथ रहे और उनका समर्थन मांगा। फिर नामांकन पत्र भरने के आखिरी दिन भाजपा के विधायकों और नेताओं से मिले। भाजपा के समर्थन से राज्यसभा के लिए निर्दलीय उम्मीदवार की तरह अपना नामांकन दाखिल किया। चुनाव मैदान में परिमल नथवाणी के आते ही कांग्रेसी खेमे में उत्तेजना, बेचैनी और घबराहट दिखाई देने लगी। वैसे यह स्थिति 18 जून की शाम तक बनी रहेगी, जब तक सभी वोट न पड़ जायें और वोटों की गिनती पूरी न हो जाये।
परिमल नाथवानी (रिलायंस इंडस्ट्रीज के डायरेक्टरों में एक) तीसरी बार राज्यसभा में जाने के लिए मैदान में उतरे हैं। वे दो बार पूर्व में झारखंड से राज्यसभा में जा चुके हैं। पहली बार जब नथवाणी चुनाव मैदान में उतरे थे, तब रांची एक बड़े अखबार के संपादक की अगुवाई में उनके खिलाफ खूब विरोध प्रदर्शन और हंगामा किया गया था। विरोध के बावजूद नथवाणी ने अपने विनम्र व्यवहार से न सिर्फ रांची वासियों को दिल जीता, बल्कि वांछित विधायकों का भी मन जीता और निर्दलीय चुनाव जीतकर राज्यसभा पहुंचे। दूसरी बार भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के कई दलों के सहयोग से निर्वाचित होकर राज्यसभा पहुंचे। पिछली बार आंध्र प्रदेश से राज्यसभा में गए थे। अब एक बार फिर झारखंड को राज्यसभा में जाने के लिए भाजपा सहित अन्य दलों के विधायकों का साथ चाहते हैं। नथवाणी को विपक्षी एनडीए के साथ-साथ सत्तारूढ़ दलों के विधायकों के समर्थन की उम्मीद है। दो बार झारखंड से राज्यसभा जाकर यहां के लिए किये गए कई कार्यों और योजनाएं आज भी क्षेत्र के लोगों के लिए उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं। उन गांवों और क्षेत्रों के लोग उन्हें याद करते हैं। भाजपा ने निर्दलीय नथवाणी का समर्थन करने का ऐलान किया है। विधानसभा में भाजपा के 21 सहित एनडीए के विधायकों की संख्या 24 है। राज्यसभा चुनाव जीतने के लिए न्यूनतम 28 का आंकड़ा चाहिए। राजनीतिक गलियारे में इस बात की चर्चा है कि नथवाणी कुछ विधायकों की ‘अंतरआत्मा की आवाज’ को जगा कर समर्थन जुटा लेंगे। नथवाणी पहले भी विधायकों की अंतरात्मा की आवाज पर चुनाव जीत चुके हैं।
राज्यसभा की दो सीटें खाली हुई है। एक गुरुजी के निधन की वजह से, दूसरी भाजपा के दीपक प्रकाश का कार्यकाल पूरा होने की वजह से खाली हुई है। एक उम्मीदवार को जीत के लिए प्रथम वरीयता के न्यूनतम 28 वोट चाहिए। यह आंकड़ा सिर्फ झामुमो के पास है, जिसके पास 34 विधायक हैं। कांग्रेस के अपने सिर्फ 16 विधायक हैं। कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा झामुमो, राजद और वामदलों के भरोसे चुनाव जीतना चाहते हैं।
56 विधायकों के समर्थन से ही झामुमो के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार चल रही है। झामुमो के 34, कांग्रेस के 16, राजद के चार और माले के दो विधायक हैं। विधानसभा के इस आंकड़े पर नजर डालें को महागठबंधन में झामुमो के बैजनाथ राम की जीत में कहीं कोई संशय नहीं है। लेकिन महागठबंधन के दूसरे उम्मीदवार प्रणव झा की जीत पर संशय बरकरार है। मतदान के वक्त ‘अंतरात्मा’ की आवाज जागने की बात कह कर कोई भी इधरसे उधर जा सकता है। ऐसे में कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा का क्या होगा, यह कहा नहीं जा सकता। आशंका तो इसी बात की है कि कांग्रेस के विधायक ही न टूट कर इधर से उधर चले जाएं। वैसे कांग्रेसियों में टूट का एक ठोस बहाना भी है। कांग्रेस दलित, अल्पसंख्यक और आदिवासी समूहों के नाम पर राजनीति करती है। सवर्ण तो अब पाला बदल कर भाजपा के साथ जा चुके हैं। इसलिए कांग्रेस जहां भी जीतती है तो दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक वोटों की ही मदद से ही। लेकिन उसने यहां राज्यसभा का टिकट एक सवर्ण को दिया है। उनके अधिकतर विधायकों में इसे लेकर बेचैनी है। इसके अलावा राजद के चार और माले के दो विधायक हैं। इन विधायकों की अंतरात्मा की आवाज क्या कहती है, यह तो चुनाव और परिणाम के दिन ही खुलासा होगा। फिलहाल झारखंड के राज्यसभा का चुनाव किसी सस्पेंस और थ्रिलर फिल्म की तरह दिलचस्प बन चुका है। सबको 18 जून का बेसब्री से इंतजार है।
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