राज्य और राजनीति
चंदन मिश्र
झारखंड साल-छह महीने में अपनी करतूतों के लिए खबरों की सुर्खियों में आ ही जाता है। कभी राज्य के राजनीतिक, कभी प्रशासनिक और कभी आर्थिक घोटाले झारखंड को राष्ट्रीय खबरों के स्तर पर पहुंचा देता है। सूबे में ताजा तरीन मामला कुछ ऐसा ही है, जो देश भर की खबरचियों को अपनी ओर खींचता है। हालांकि आज के प्रशासनिक तंत्र के जो हालात हैं, उसमें जो नहीं हो रहा है, वह कम है। हजारीबाग, बोकारो, धनबाद, पलामू सहित कई जिलों से होते हुए ट्रेज़री घोटाले का जाल कहां तक फैल चुका है, इसकी गंभीरता से जांच जरूरी है। वैसे तो इस मामले की जांच किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी को सौंप देनी चाहिए, लेकिन केंद्र और राज्य की सरकारें अलग अलग होने की वजह से केंद्रीय एजेंसी को जांच देने में एकरूपता नहीं है। इसकी न्यायिक जांच भी कराई जा सकती है। यह झारखंड के लिए एक गंभीर मामला है और आर्थिक प्रबंधन को छिन्न- भिन्न करने के लिए काफी है। राज्य की ट्रेज़री को लूटने वालों का नेटवर्क कितना गहरा और दूर तक है, इसकी जांच जरूरी है।
झारखंड में पिछले कुछ दिनों से उजागर हो रहा ट्रेज़री घोटाला झारखंड समेत पूरे देश में गंभीर चिंता और चर्चा का विषय बन चुका है। यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक और संगठित भ्रष्टाचार की ओर संकेत करता है। यह घोटाला एकीकृत बिहार के चारा घोटाला के काले अध्याय की पुनरावृत्ति सी प्रतीत हो रही है। जिस प्रकार चारा घोटाले में डोरंडा ट्रेज़री से 140 करोड़ रुपये की अवैध निकासी हुई थी, उसी तरह वर्तमान में झारखंड के कई जिलों में, पुलिस विभाग के माध्यम से करोड़ों रुपये की अवैध निकासी के मामले सामने आ रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, इस घोटाले की पुष्टि बोकारो, हजारीबाग, साहिबगंज, गढ़वा और पलामू जिलों में हो चुकी है। केवल इन जिलों से ही 35 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध निकासी की आरंभिक सूचना बाहर आई है। यह आँकड़ा अपने आप में गंभीर है, लेकिन जिस गति से नए-नए तथ्य सामने आ रहे हैं, उससे यह स्पष्ट है कि यह घोटाला कहीं अधिक व्यापक और गहरा हो सकता है।
प्रारंभिक स्तर पर यह मामला केवल बोकारो जिले तक सीमित प्रतीत हो रहा था, लेकिन जैसे-जैसे जाँच आगे बढ़ी और परतें खुलती गईं, यह स्पष्ट हो गया कि अवैध निकासी का यह जाल हजारीबाग, गढ़वा, साहिबगंज और पलामू तक फैल चुका है। इससे यह प्रतीत होता है कि यह कोई स्थानीय या सीमित स्तर का घोटाला नहीं, बल्कि पूरे झारखंड में फैला एक संगठित आर्थिक अपराध है।
बोकारो में गिरफ्तार लेखापाल कौशल पांडेय को इस पूरे घोटाले का मुख्य आरोपी कहना अभी बहुत जल्दबाजी होगी। एक अकेला लेखापाल ई-कुबेर प्रणाली में छेड़छाड़ कर करोड़ों रुपये की अवैध निकासी जैसे जटिल षड्यंत्र को अपने बूते अंजाम नहीं दे सकता है। ऐसा समझा जा सकता है के यह मामला किसी बड़े नेटवर्क और उच्चस्तरीय मिलीभगत से जुड़ा हुआ है।
बोकारो जिले में उपेंद्र सिंह के नाम पर वेतन की राशि अनु पांडे के खाते में 63 बार स्थानांतरित होती रही और पूरे पुलिस महकमे को इसकी जानकारी तक नहीं हुई। यह स्थिति अत्यंत संदिग्ध है और यह मानना कठिन है कि बिना वरीय पुलिस अधिकारियों की जानकारी या मिलीभगत के ऐसा संभव नहीं हो सकता है।
इस पूरे प्रकरण में एक और चिंताजनक पहलू यह है कि कौशल पांडेय जैसे आपराधिक प्रवृत्ति के व्यक्ति को पुलिस के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने प्रशस्ति पत्र प्रदान कर एक तरह से उसकी हौसला हफ़जाई की।
घोटाले की राशि भी लगातार बढ़ती जा रही है। बोकारो में जहाँ प्रारंभिक आँकड़ा 3.5 करोड़ रुपये का बताया गया था, वह बढ़कर 4.5 करोड़ और फिर 6 करोड़ तक पहुँच गया। इसी प्रकार हजारीबाग में यह राशि बढ़ते-बढ़ते 28 करोड़ रुपये तक पहुँच गई। केवल दो जिलों में ही प्रारंभिक जाँच में लगभग 35 करोड़ रुपये की अवैध निकासी की पुष्टि होना मामले की गंभीरता को दर्शाता है। इस मामले की गहन और निष्पक्ष जाँच कराई जाए, तो यह घोटाला हजारों करोड़ रुपये तक पहुँच सकता है। इस पूरे घोटाले में जैप आईटी की भूमिका की जाँच भी जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि तकनीकी स्तर पर किस प्रकार की हेराफेरी की गई और किन लोगों की इसमें संलिप्तता रही।
झारखंड में ट्रेज़री से अवैध निकासी की घटनाएँ कोई नई बात नहीं है। आपके कार्यकाल में इससे पूर्व भी ऊर्जा विभाग से लगभग 100 करोड़ रुपये, पर्यटन विभाग से लगभग 10 करोड़ रुपये तथा पेयजल एवं स्वच्छता विभाग से लगभग 23 करोड़ रुपये की अवैध निकासी के मामले सामने आ चुके हैं।
राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने इस मामले की जांच के आदेश दिए हैं। इधर नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर इस घोटाले की जांच सीबीआई से या न्यायिक पदाधिकारियों से कराने का आग्रह किया है। उधर सत्ताधारी दल के नेताओं ने इस गड़बड़ियों के लिए पूर्ववर्ती भाजपा सरकार को दोषी ठहराने की कोशिश की है। अब देखना होगा कि सरकार इसे कितनी गंभीरता से लेती है और इसकी जांच कैसे कराती है।
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