• समाचार विश्लेषण
चंदन मिश्र
झारखंड की सियासत ने आज एक नया इतिहास रचा। संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा की खाली होनेवाली दो सीटों के लिए हुए चुनाव में एक निर्दलीय उम्मीदवार ने सूबे की सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी से ज्यादा वोट प्राप्त कर बड़ी जीत हासिल की है। झारखंड से पहले दो बार राज्यसभा के लिए निर्वाचित हो चुके परिमल नथवाणी ने नया रिकॉर्ड बनाते हुए बतौर निर्दलीय तीसरी बार राज्यसभा के लिए चुने गये। परिमल नथवाणी की इस जीत के कई मायने हैं। उनकी जीत ने भाजपा और एनडीए का मान बढ़ाया। इन दलों को ऊर्जान्वित किया। वहीं झारखंड की सत्तारूढ़ इंडिया गठबंधन की एकता को छिन्न-भिन्न करके रख दिया। कांग्रेस की जितनी बुरी हार हुई है, कांग्रेस आनेवाले दिनों में उबर नहीं पायेगी।
भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने चुनाव में परिमल नथवाणी का समर्थन किया था। परिमल नथवाणी को 81 में कुल 28 वोट आए जो एक उम्मीदवार की जीत के लिए निर्धारित वोट थे। हालांकि उनके सामने कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा सिर्फ 19 वोट लाकर बुरी तरह पिछड़े। उनके सहयोगी दलों राजद और भाकपा माले ने भी उनका साथ नहीं दिया। आंकड़ों पर गौर करें तो कांग्रेस पार्टी के 16 वोटों के अलावा संभवत झामुमो के तीन वोट उन्हें मिले हैं। वैसे आधिकारिक आंकड़ा आने के बाद ही इसका खुलासा होगा कि किस दल के कितने वोट किस उम्मीदवार को मिले।
परिमल नथवाणी पहले दो बार झारखंड, फिर तीसरी बार आंध्र प्रदेश से वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार के रूप में जीतकर राज्यसभा पहुंचे थे। अभी उसी दल के राज्यसभा सदस्य हैं, जिनका कार्यकाल इसी महीने पूरा होनेवाला है। फिर नथवाणी झारखंड से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में शपथ लेंगे।
परिमल नथवानी ने इस बार झारखंड में अपने चुनावी अभियान की शुरुआत मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात के बाद शुरू की थी। रांची पहुंचते ही सबसे पहले हेमंत सोरेन के आवास पर पहुंचे और लगभग ढाई घंटे तक उनके साथ रहे। इसके कई अर्थ निकाले गए। फिर वह भाजपा के स्थानीय नेताओं से मुलाकात की। भाजपा अपने उम्मीदवार गौरव वल्लभ से नामांकन पत्र भी खरीदवा चुकी थी। बाद में केंद्र से निर्देश मिलने के बाद परिमल नथवानी को समर्थन देने का निर्णय लिया गया। नथवानी ने भाजपा के समर्थन से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में अपना पर्चा भरा। फिर जीत के रणनीति बननी शुरू हो गई।
परिमल नथवाणी का सियासी सफर झारखंड से ही 2008 में शुरू हुआ, जब वह पहली बार यहां से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा पहुंचे थे। नथवाणी जब पहली बार झारखंड में राज्यसभा चुनाव लड़ने के लिए आए थे, तब उनके खिलाफ यहां के कुछ बुद्धिजीवियों ने जमकर विरोध किया था। एक अखबार के संपादक ही उनके खिलाफ विरोध आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे।
परिमल नथवाणी ने अपने सियासी सफर की शुरुआत साल 2008 में झारखंड से की थी, जब वह पहली निर्दलीय चुनाव लड़े थे और कई दलों के समर्थन से पहली बार राज्यसभा पहुंचे थे। इसके बाद साल 2014 में उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता इतनी बढ़ी कि वे भाजपा और आजसू के समर्थन से निर्विरोध राज्यसभा के लिए चुन लिए गए। परिमल नथवाणी ने अपने दोनों कार्यकाल में अपने कामकाज से अलग पहचान बनाई। उन्होंने दो गांवों को गोद लिया। उनका कायाकल्प कर दिया। शहरी क्षेत्र के गरीब बस्तियों के लिए भी नथवाणी ने कई काम किये। रांची के निकट नामकुम के आरा बड़ाम में उन्होंने आमलोगों के लिए बड़े निर्माण कार्य, सामुदायिक भवन और कानूनी सहायता केंद्र खोला। इसका लाभ आसपास के लोगों को मिला। पहले कार्यकाल में कांके के निकट एक गांव को गोद लेकर उसके सामाजिक बदलाव के लिए लगातार काम किया। गांव में शराब बंदी, बिजली, पानी के संकट दूर करने में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई। गांव के बीचोंबीच पारंपरिक अखरा स्थल का निर्माण कराया। हर घर को बिजली मिले, इसकी व्यवस्था की। झारखंड से जुड़े गंभीर मामलों को लगातार संसद में उठाया और सरकार से उन समस्याओं के निदान के लिए सहयोग भी मांगा। उन्हें नजदीक से जाननेवाले जानते हैं कि उन्हें मिलेनेवाली संसदीय क्षेत्र विकास योजना फंड में कोई घपलेबाजी नहीं होती है। कोई कमीशन खोरी नहीं चलती है। लाभुकों को योजना का सीधा लाभ मिलता है। इसलिए लोग उनके कामों को आज भी याद करते हैं।
2026 में फिर झारखंड वापसी’: अब 2026 में नथवाणी एक बार फिर झारखंड के मैदान में उतरे। इस बार उन्हें भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का पुरजोर समर्थन मिला, जिसने उनकी जीत की राह को बेहद आसान बना दिया। जाहिर है कि परिमल नथवाणी झारखंड में एक बार फिर से विकास के लिए नये आयाम गढ़ेंगे। जनहित की योजनाओं को लाएंगे और जनप्रतिनिधियों की उम्मीदों को पूरा करने की कोशिश करेंगे।
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