भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास पूर्व पीठिका के रूप में हूल का महत्वपूर्ण स्थान है। अन्यान्य, शोषण, उत्पीड़न के खिलाफ जितने भी आन्दोलन विश्व में हुए हैं, उनसे अलग 1855 का हूल आन्दोलन है क्योंकि इसकी शुरुआत समाज के अंतिम पायदान पर खड़े हजारों वंचित-पीड़ितों के द्वारा आन्दोलन किया गया। इस आन्दोलन के महानायक एक-दो नहीं चार सहोदर भाइयों ने किया।जिसकी शुरुआत साहिबगंज जिला के भोगनाडीह से हुई, जिसमें हजारों आन्दोलनकारी मौत के घाट उतर गये। तत्कालीन सरकार के कारिंदे, क्रूरता, जमींदार, सैनिकों को भी आन्दोलनकारियों के मौत के घाट उतार दिया। सरकार ब्रिटिश सरकार चिंतित हुई ।अंततः कानून बनाकर संथाल परगना को प्रशासनिक ईकाई बनाना पड़ा। 1855 से लेकर आजतक राजनीतिक, सामाजिक, प्रशासनिक परिवर्तन हुए।
देश स्वतंत्र हुआ। स्थिति-परिस्थिति में बदलाव हुआ। बंगाल से बिहार व उड़ीसा अलग हुआ और सुवर्ण पूर्व बिहार से झारखंड अलग हुआ का प्रकृति झारखंड में अब आदिवासी नेतृत्व की ही जिन उद्देश्यों को लेकर आज से लगभग 170 वर्ष पूर्व हूल हुआ था, उससे कितना परिवर्तन एवं जनजातीय जीवन शैली में सुधार हुआ। अनेक अवसरों पर राजनीतिक-सामाजिक संगठनों के द्वारा जल-जंगल-जमीन, पर्यावरण-पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए पुनः हूल की आवश्यकता बताते हैं। संताल एक्सप्रेस दैनिक, दुमका के द्वारा हूल दिवस (30 जून) पर संवाद स्थापित करना चाहता है कि “क्या आज झारखंड जंगल-जंगल, जमीन, पर्यावरण-पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए एक और हूल आवश्यक है?” सिद्धो-कान्हू-चाँद-भैरव भाइयों के द्वारा जो हूल हुआ था, उस समय परिस्थिति अलग थी। सामने ब्रिटिश और महाजन थे। लेकिन आज भारत स्वतंत्र है, उसका अपना संविधान है। कोई भी आन्दोलन, हूल, अभियान संविधान के शीर्ष मानते हुआ करना है। जो विषय है वह सर्वाधिक प्रासंगिक है। विकास के नाम पर विस्थापन के खिलाफ, प्राकृतिक संसाधनों, जल स्रोतों, नदियों, पोखरों एवं जंगलों को बचाने के लिए हूल प्रासंगिक बन जायगा। प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर झारखंड के खनिजों का उत्खनन हो रहा है जहाँ विस्थापन, जंगल कटाई एवं जल स्रोतों के खिलाफ व कानूनों के दायरे में माँगों के लिए हूल करना है।
झारखंड राज्य का निर्माण जल-जंगल-जमीन की रक्षा के साथ ही आदिवासियों के पारंपरिक न्याय व्यवस्था की रक्षा के लिए भी हुआ है। संविधान में जनजातीय क्षेत्र के लिए विशेष प्रावधान है उससे अवमानना के खिलाफ हूल प्रासंगिक हो जायगा। वर्तमान में आदिवासी नेतृत्व की सरकार है जो झारखंड के विकास के लिए काम कर रही है। संवेदनशील सरकार से संवाद स्थापित कर प्रसंगानुकूल विषयों का समाधान हो, अन्यथा विवश होकर पीड़ित समुदाय पुनः हूल का आह्वान क्या नहीं करेंगे? समस्याओं का समाधान हूल से नहीं बातों से ही श्रेयस्कर है।


