आदिवासियों के लिए आज भी जल,जंगल एवं जमीन है बड़ा मुद्दा
डॉ.सुमन कुमार
30 जून को न सिर्फ झारखंड-बिहार के साथ ही पश्चिम बंगाल और ओडिशा के आदिवासी इलाकों में हूल दिवस मनाया जाता है।171 साल पहले 1855 में 30 जून के दिन ही संताल हूल के महानायकों सिदो मुर्मू और कान्हु मुर्मू के नेतृत्व में महाजनी शोषण और जमींदारों एवं अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ संतालों ने विद्रोह कर दिया था,जो इतिहास के पन्नों में संताल हूल (संताल क्रांति) के रूप में दर्ज है।30 जून का यह ऐतिहासिक दिन स्मृति दिवस के साथ संताल समाज के स्वाभिमान और अधिकारों के लिए संघर्ष को याद करने का दिन है।संताल हूल केवल शोषण और अत्याचार के खिलाफ एक बड़ा जन आंदोलन था। संसाधनों पर कब्जे के खिलाफ एक व्यापक जनाक्रोश था।यह जल,जंगल,जमीन के साथ आदिवासी अस्मिता,अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई थी।आज संताल हूल के 171 वर्षों बाद भी यह सवाल अपनी जगह कायम है कि संताल हूल के जो मुद्दे थे और तब की जो परिस्थितियां थीं,उसमें अहम बदलाव हुए या फिर आज भी किसी न किसी रूप में संताल हूल की परिस्थितियां बरकरार हैं।यह जगजाहिर है कि झारखंड प्राकृतिक संसाधनों और कोयला, लौह अयस्क, पत्थर, अभ्रक, बॉक्साइट जैसे कई खनिज-संपदा से समृद्ध राज्य है।यह भी सच है कि प्राकृतिक खनिज-संपदा से भरपूर झारखंड के आदिवासी और मूलवासी आज भी गरीब हैं।यह स्थिति तब है जबकि खनिजों की खदानें अधिकांशतः आदिवासियों की जमीन पर है।अपनी ही जमीन पर चल रही खदानों में यहां के आदिवासी मजदूर बनकर काम करने को मजबूर हैं।अपनी जमीन की सुरक्षा करना आदिवासियों के लिए एक बड़ी चुनौती है और विस्थापन का डर सबसे बड़ी समस्या।खनिजों के खनन के मकसद से कब कौन कम्पनी आ जाए और हमारी जमीन छीन जाए,यह चिंता आज आदिवासी समाज को सबसे अधिक सत्ता रही है।लोग गरीबी के साथ जमीन को लेकर भारी असुरक्षा की आशंका के बीच जी रहे हैं।जंगल आदिवासी जनजीवन का आधार रहा है।उनकी आजीविका का बहुत बड़ा आधार जंगल रहा है।घने जंगल कट चुके हैं और जमीन खतरे में है। लोहा-कोयला की खदानों, कल-कारखानों, बड़े-बड़े डैम और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के नाम पर अब तक लाखों परिवार अपनी जमीन से विस्थापित हो चुके है। अधिकांश विस्थापित परिवारों को न पर्याप्त मुआवजा मिला और न उन्हें पुनर्वासित किया गया।वनाधिकार,जमीन अधिग्रहण और पर्यावरणीय असंतुलन के जो हालात बने हैं,हम कह सकते हैं कि संताल हूल के 171 साल बाद भी झारखंड में जल, जंगल और जमीन बहुत बड़ा मुद्दा है।
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संताल परगना में जल,जंगल और जमीन से जुड़े प्रमुख मुद्दे
झारखंड खास कर संताल परगना में जल, जंगल और जमीन आदिवासियों के लिए सिर्फ संसाधन नहीं है। जल,जंगल और जमीन से उनकी पहचान और संस्कृति जुड़ी हुई है।जल,जंगल,जमीन उनके अस्तित्व का आधार है। जल,जंगल और जमीन से जुड़े संताल परगना के कुछ प्रमुख मुद्दे इस प्रकार हैं-
1.जमीन कब्जा और जमीन का अवैध हस्तांतरण
संताल परगना काश्तकारी कानून (एसपीटी एक्ट) के द्वारा जमीन की खरीद-बिक्री पर रोक है।इसके बावजूद बड़े पैमाने पर आदिवासियों की जमीन पर लोगों ने कब्जा कर रखा है।अवैध रूप से जमीन हस्तांतरण भी हो रहा है।बिचौलियों की सक्रियता से फर्जी दस्तावेज के माध्यम से जमीन का हस्तांतरण हो रहा है।
2.कोयला-पत्थर खदानों में जा रही जमीन, बढ़ रहा प्रदूषण
संताल परगना में धड़ाधड़ कोयला खदानें खुल रही हैं।दुमका,पाकुड और साहिबगंज इलाके में रैयती जमीन पर एक हजार से अधिक पत्थर खदानें और स्टोन क्रशर चल रही हैं।खनन कार्य से रैयतों को दोहरी मार पड़ रही है।एक तो अपनी जमीन से विस्थापित होना पड़ रहा है और दूसरे खनन से होने वाले प्रदूषण के खतरे से जूझना पड़ रहा है।
3.विकास के नाम पर जमीन अधिग्रहण
जमीन संताल हूल का बड़ा मुद्दा था।आज भी संताल परगना में आदिवासियों के लिए जमीन बचाना बड़ी चुनौती है।पत्थर-कोयला खदानों के लिए आदिवासियों की जमीन बाहरी और कम्पनियों का कब्जा हो रहा है। सड़क, उद्योग, रेलवे, पावर प्रोजेक्ट के लिए हो रहे जमीन अधिग्रहण से भी आदिवासी अपनी जमीन से विस्थापित हो रहे हैं।
4.बालू खनन से नदियों पर संकट, प्राकृतिक जल स्रोत भी सूखे
नदियों से बड़े पैमाने पर बालू के वैध-अवैध खनन से नदियों का अस्तित्व संकट में है।प्राकृतिक जल स्रोतों भी तेजी से सूख रहे हैं।नदी-तालाब, कुआं और अन्य प्राकृतिक जल स्रोतों के सूखने से आम जनजीवन के साथ ही विशेष रूप से यहां का आदिवासी जन जीवन प्रभावित हुआ है।
5.जंगल कटने से आजीविका पर असर
वन माफियाओं की सक्रियता से बड़े पैमाने पर जंगल कट गए।इससे भी आदिवासी जनजीवन प्रभावित हुआ।आदिवासी जीवन शैली में जंगल का महत्वपूर्ण स्थान है।दतुवन,जलावन के लिए लकड़ी,महुआ,साल पत्ता,तेंदूपत्ता,फल और औषधि आदि से आदिवासियों की आजीविका चलती रही है।जंगल पर आदिवासियों के परम्परागत अधिकार का जो भाव था,वह अब नहीं रहा।आदिवासियों के बीच वनाधिकार पट्टा वितरण की योजना भी सुस्त गति से चल रही है।
6.परंपरागत स्वशासन व्यवस्था कमजोर,पेसा कानून भी प्रभावी नहीं
संताल परगना के आदिवासी गांवों में आदिवासी समाज की अपनी परम्परागत स्वशासन व्यवस्था रही है।ग्राम सभा का विशेष महत्व रहा है जिसका संचालन गांव का परम्परागत ग्राम प्रधान करते रहे हैं।धीरे-धीरे आदिवासियों की यह परम्परागत स्वशासन व्यवस्था दम तोड़ रही है।
झारखंड सरकार ने पेसा एक्ट के माध्यम से ग्राम सभा को सशक्त करने की पहल की है,पर जमीनी स्तर पर अभी इसका प्रभाव नहीं दिख रहा है।
7.रोजगार के लिए पलायन मजबूरी
आज के युवाओं के समक्ष सबसे बड़ी समस्या रोजगार का संकट है।आदिवासी युवा सबसे अधिक प्रभावित हैं।आज काम की तलाश में दिल्ली-मुम्बई और अन्य महानगरों में पलायन कर रहे लोगों में सर्वाधिक आदिवासी हैं।काम दिलाने के नाम पर आदिवासी युवतियों का कई तरह से शोषण होने की खबरें अक्सर सामने आती है।


