नई दिल्ली । टूथपेस्ट, माउथवॉश और इलेक्ट्रिक ब्रश के इस दौर में दांतों की सफाई के लिए सदियों पुरानी दातुन की परंपरा आज भी आयुर्वेद में खास महत्व रखती है। आयुर्वेद के अनुसार दातुन केवल दांत साफ करने का साधन नहीं है, बल्कि यह शरीर के भीतर कई स्तरों पर स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का काम करती है।
खास बात यह है कि दातुन का असर केवल ओरल हेल्थ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका संबंध पाचन तंत्र और आंखों की सेहत से भी जुड़ा हुआ है। आयुर्वेद में दातुन को मुख का संरक्षक कहा गया है। सुबह-सुबह दातुन चबाने से उसके कसैले और औषधीय गुण लार में मिल जाते हैं। यह लार जब पेट में पहुंचती है, तो पाचन अग्नि को सक्रिय करने में मदद करती है। इससे कब्ज, गैस और एसिडिटी जैसी समस्याओं में राहत मिलती है और भोजन का पाचन बेहतर होता है। यानी दातुन का असर सीधे पेट की सेहत से जुड़ा हुआ है, जो पूरे शरीर के संतुलन के लिए बेहद जरूरी माना गया है। दातुन का एक अहम लाभ आंखों की सेहत से भी जुड़ा है।
आयुर्वेद मानता है कि दांतों की नसों का सीधा संबंध मस्तिष्क और आंखों से होता है। जब दातुन को चबाया जाता है, तो यह नसों को सक्रिय करती है और उनके कामकाज को बेहतर बनाती है। इसका असर आंखों की कार्यक्षमता पर भी पड़ता है, जिससे आंखों की रोशनी में सुधार होने की बात कही जाती है। यही कारण है कि पुराने समय में आंखों की कमजोरी की समस्या अपेक्षाकृत कम देखने को मिलती थी।
ओरल हेल्थ के लिहाज से भी दातुन किसी औषधि से कम नहीं है। मसूड़ों से खून आना, सूजन, दर्द, पायरिया या दांतों की कमजोरी जैसी समस्याओं में दातुन लाभकारी मानी जाती है। इसके नियमित इस्तेमाल से मसूड़ों में कसाव आता है और दांतों को जड़ से मजबूती मिलती है, जिससे वे लंबे समय तक स्वस्थ बने रहते हैं। साथ ही दातुन जीभ की सफाई में भी मदद करती है। आयुर्वेद में दातुन के बाद जीभ को साफ करने की परंपरा है, जिससे जीभ पर जमी टॉक्सिन की परत हटती है और मुंह की बदबू व अन्य समस्याएं कम होती हैं। दातुन के लिए नीम, बबूल, अपामार्ग, बरगद, खेर और अर्जुन जैसे पेड़ों की टहनी को सबसे उपयुक्त माना गया है।
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