नई दिल्ली । भारत में एमबीबीएस की शिक्षा के लिए निजी मेडिकल कॉलेजों मे पढ़ाई का खर्च करोडों रुपए होता है। एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉक्टरों को सरकारी नौकरी नहीं मिल रही है।पीजी कोर्स करने के लिए सीटें उपलब्ध नहीं है। इसमें सबसे ज्यादा खराब हालत एमबीबीएस डॉक्टरों की हो रही है। कई साल बीत जाने के बाद भी उन्हें सरकारी नौकरी हासिल नहीं हो पा रही है। वहीं निजी मेडिकल कॉलेज में उन्हें बहुत कम वेतन दिया जा रहा है। जिसके कारण छात्रों में एमबीबीएस की पढ़ाई को लेकर अरुचि देखने को मिल रही है। हर साल नीट के अभ्यर्थी काम होते चले जा रहे हैं।
नीट-यूजी में प्रवेश के लिए कड़ी स्पर्धा है। कोचिंग में लाखों रुपए खर्च करने पड़ते हैं। उसके बाद नीट में पर्याप्त नंबर नहीं मिलते हैं। तो प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में दाखिला लेना होता है। नीट की परीक्षा में जिन छात्र-छात्राओं के स्कोर बहुत अच्छे होते हैं। उन्हीं को सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश मिल पाता है।
निजी मेडिकल कॉलेजों और नए सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीखने के अवसर बहुत कम मिलते है। यहां पर मरीजों की संख्या कम होती है। तथा विशेषज्ञ डाक्टर भी पर्याप्त संख्या में नहीं होते हैं।जिसके कारण एमबीबीएस की पढ़ाई करने वालों छात्रों को वह योग्यता नहीं मिल पाती है। जो उन्हें मिलनी चाहिए।
सरकारी नौकरी में कड़ी प्रतिस्पर्धा है। हर साल लाखों डॉक्टर एमबीबीएस करके बाहर निकलते हैं।लेकिन इन्हें नौकरी नहीं मिल पाती है। करोड़ों रुपए पढ़ाई में खर्च करने के बाद भी बामुश्किल 60000 रूपये की नौकरी मिलती है। जिसके कारण एमबीबीएस डॉक्टर और उनके अभिभावकों में नाराजी देखने को मिल रही है।वहीं नीट परीक्षा को लेकर क्रेज अब घटता चला जा रहा है।
पीजी के लिए कम सीटें, भारी फीस
2025-26 में एमबीबीएस कोर्स के लिए 124825 सीटों की स्वीकृति दी गई है। वहीं पीजी कोर्स के लिए मात्र 76174 सीट उपलब्ध है। जिसके कारण एमबीबीएस करने के बाद पीजी करने का मौका 50 फ़ीसदी एमबीबीएस डॉक्टरों को नहीं मिलता है। निजी मेडिकल कॉलेजों में पीजी कोर्स के लिए करोड़ों रुपए खर्च करने पड़ते हैं। जो आमतौर पर संभव नहीं होता है। एलोपैथी डॉक्टरों की संख्या 2024 तक 13.46 लाख थी। केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा डॉक्टरों की जो नियुक्ति की जा रही हैं। वह 10 फीसदी भी नहीं है।जिसके कारण एमबीबीएस की डिग्री को लेकर युवाओं में वह उत्साह देखने को नहीं मिल रहा है। जो कुछ वर्ष पहले देखने को मिल रहा था।


