दादा ने नींव रखी, पिता ने विस्तार किया और अब मोहन भागवत
नई दिल्ली । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 वर्ष पूरे होने पर संगठन की यात्रा को समेटती कहानियों में मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत के परिवार का योगदान बहुत बड़ा है। भागवत परिवार की तीन पीढ़ियों ने संघ की नींव से लेकर विस्तार और मजबूती तक में अहम भूमिका निभाई है।
संघ की स्थापना के समय मोहन भागवत के दादा श्रीनारायण पांडुरंग भागवत (नाना साहेब) ने डॉक्टर हेडगेवार का साथ देकर संगठन को जमीनी स्तर पर खड़ा करने में अपना जीवन खापा दिया। 1884 में जन्मे नाना साहेब पेशे से वकील थे और चंद्रपुर में उनकी गिनती नामी अधिवक्ताओं में होती थी। डॉ. हेडगेवार ने जब चंद्रपुर में संघ की शाखा शुरू की, तब नाना साहेब ने अपना घर संघ कार्यकर्ताओं के लिए खोल दिया। उनके घर पर ही बैठकें, प्रवास और भोजन की व्यवस्था होती थी। यही नहीं, बच्चों के प्रति उनका स्नेहपूर्ण व्यवहार शाखा के विस्तार की बड़ी वजह बना।
नाना साहेब के बेटे मधुकर राव भागवत ने भी जीवन संघ को समर्पित किया। उन्हें 1941 में प्रचारक बनाकर गुजरात भेजा गया। वहां उन्होंने सूरत और अहमदाबाद से शुरुआत करते हुए 115 शहरों और कस्बों में शाखाएं खड़ी कर दीं। पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे नेताओं के जीवन पर मधुकर राव का गहरा असर रहा। पीएम मोदी ने अपनी किताब ‘ज्योतिपुंज’ में विस्तार से लिखा है कि कैसे उन्होंने युवावस्था में राव से प्रेरणा ली थी।
1943-44 में गुरु गोलवलकर ने राव को उत्तर भारत और सिंध के कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण की जिम्मेदारी दी। इस दौरान आडवाणी जैसे नेता भी उनसे जुड़े। विवाह के बाद भी मधुकर राव ने गुजरात और चंद्रपुर में सक्रिय रहकर संघ को मजबूत किया।
आज संघ प्रमुख मोहन भागवत उसी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके दादा ने नींव रखी, पिता ने विस्तार किया और अब तीसरी पीढ़ी संगठन के शीर्ष पर है। संघ की सौ साल की यात्रा में भागवत परिवार की भूमिका इसका जीता जगाता प्रमाण है कि कैसे एक परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी संगठन और विचारधारा के प्रति समर्पण की मिसाल पेश कर सकता है।


