नई दिल्ली । पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने बातचीत के दौरान भारत की विदेश और व्यापार नीति पर महत्वपूर्ण और स्पष्ट विचार रखे हैं। पूर्व थलसेना प्रमुख नरवणे ने कहा कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की नीति पर कायम रहेगा। इसका अर्थ है कि भारत अपने हितों और सिद्धांतों के आधार पर स्वतंत्र दृष्टिकोण अपनाएगा और किसी भी देश के बाहरी दबाव में अपनी नीतियों को नहीं बदलेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत अपने लोगों के हितों को सर्वोपरि रखेगा। इस बात से किसी भी तरह से कोई समझौता नहीं करेगा। सस्ते दाम पर तेल या अन्य सामान खरीदना देश में महंगाई को रोकने और लोगों को लाभ पहुँचाने के लिए जरुरी है। उनका सवाल था कि जब यूरोप रूस से गैस खरीद रहा है और अमेरिका भी व्यापार कर रहा है, फिर केवल भारत को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है। जनरल नरवणे ने दो टूक शब्दों में कहा कि कोई भी देश भारत को यह निर्देश नहीं दे सकता कि वह किससे व्यापार करे और किससे साथ नहीं करे। उन्होंने कहा, हम जिससे चाहें, उससे तेल और सामना खरीद सकते है। कोई और हमें यह निर्देश देने वाला कौन होता है? यह भारत की स्वतंत्र क्रय शक्ति पर ज़ोर देता है।
उन्होंने उन देशों की नीतियों पर सवाल उठाया जो भारत पर प्रतिबंधों के कारण वेनेजुएला, ईरान या रूस जैसे देशों से व्यापार न करने का दबाव डालते हैं, जबकि चाहते हैं कि भारत केवल उनसे व्यापार करे जिससे उनके (दबाव बनाने वाले देशों के) स्वार्थ पूरे हों। उन्होंने इसे किसी भी स्वाभिमानी देश के लिए अस्वीकार्य बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत पूरी तरह से रूस पर निर्भर नहीं है, बल्कि दुनिया के कई अन्य देशों से भी आयात करता है। उन्होंने कहा कि हम वहीं करने वाले हैं, जो हम चाहते हैं, और मुझे लगता है कि हम उस स्थिति में पहुंच चुके हैं जहां हमें किसी और की बात सुनने की जरूरत नहीं है।
उन्होंने स्वीकार किया कि भारत और अमेरिका के बीच उत्कृष्ट संबंध हैं, लेकिन किसी भी रिश्ते में उतार-चढ़ाव आते हैं। उन्होंने कहा कि देशों के संबंध कई स्तरों पर (राजनीतिक, कूटनीतिक, व्यापारिक, सैन्य) चलते हैं, इसलिए एक स्तर पर समस्या आने से पूरा रिश्ता खराब नहीं होता।
भारत-अमेरिका संबंधों पर विचार
जनरल नरवणे ने भारत और अमेरिका के बीच संबंधों को लेकर कहा कि दोनों देशों के बीच हमेशा से उत्कृष्ट संबंध रहे हैं, लेकिन किसी भी रिश्ते में उतार-चढ़ाव आते हैं। उन्होंने कहा, पहले भी दो बड़े उतार-चढ़ाव आए हैं, लेकिन हमने हमेशा इन तूफानों का सामना किया और पहले से अधिक मजबूत होकर उभरे हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि देशों के बीच संबंध केवल एक स्तर पर नहीं चलते, बल्कि इसमें राजनीतिक, कूटनीतिक, व्यापारिक, सैन्य और लोगों से लोगों के बीच संपर्क जैसे कई कारक शामिल होते हैं। यह जरूरी नहीं कि एक स्तर पर समस्या होने से पूरा रिश्ता खराब हो जाए।
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