अंजनी शरण
झारखंड की डेमोग्राफी में जो सबसे महत्वपूर्ण बदलाव सबसे पहले दिखा वह 18 वी सदी में संथाल के आगमन से राजमहल के आसपास हुआ। संथाल विद्रोह के बाद से गैर आदिवासियों को जमीन न बेचने का फैसला अभी तक लागू है फिर भी कई और वजहें है जिनसे जनसंख्या के आंकड़ों में तेजी से बदलाव दिख रहा है। सरकारी सूचना तंत्र के पास निश्चय ही आंकड़े भी उपलब्ध है जिनसे इस बदलाव का सत्यापन किया जा सकता है। आजादी के बाद से ईसाई मिशनरियों ने जिस तरह से धीरे धीरे अपनी पैठ समस्त झारखंड और विशेषकर संथाल परगना में बनाया , धर्म आधारित जनगणना के आंकड़े जरूर बदले पर ये लोग झारखंड के आदिवासी ही है और इसलिए जनसंखियिकी में इसे बदलाव नहीं माना जा सकता। पाकुड़ और मालदा के बीच इलाका बंगलदेश की सीमा से काफी नजदीक है और सिर्फ एक नदी से बंटा हुआ है। बांग्लादेश में आबादी का घनत्व और प्रति व्यक्ति आय, शिक्षा, संसाधन और ऐसे संघर्ष की वजह से भारत का ओर पलायन पिछले दशकों से लगातार जारी है। इस्लाम जनसांख्यिकी को लेकर संवेदनशील रहा है और यही वजह है की मुसाफिरखानो में ऐसे घुसपैठियों को आसरा मिल जाया करता और बाद में राशन कार्ड और वोटर कार्ड उन्हे स्थायित्व दे देता। मुस्लिम आबादी वाली बस्ती में रहन सहन और किसी प्रवासी का वासोवास के लिए वहीं बस जाना एक आसान उपक्रम रहा है। संथाल जनसंख्या में शराब परम्परा से आगे बढ़कर कब विकृत हुआ और पुरुषो के असामयिक मौत तथा मजदूरी के लिए प्रवास ने गैर आदिवासियों को संथाल महिलाओं से वैवाहिक अवसर दे दिया जिसमे सिर्फ मुस्लिम नही थे। सरकार या स्थानीय राजनीति इससे अनभिज्ञ नहीं थी लेकिन राजनीति का दुष्प्रेरण परोक्ष रूप से इसका समर्थन करता गया और जनसंख्यिकी का कोई बदलाव दूसरी तीसरी पीढ़ी आते आते विस्फोट करता है ,ताजा मतदाता सूची इसी विस्फोट का एक नजारा है। उच्च जन्म दर और एक से अधिक विवाह , गर्भ निरोधक की वर्जना ने इसे विकराल बना दिया है। दुमका नगर के मतदाता सूची में ऐसे कई नाम मिलते हैं जिसमे मतदाता के पिता का नाम नमालुम दर्ज है, यह एक तकनीकी भूल भी हो सकती है पर अगर ऐसा है तो इरादतन ये सारे मतदाता धर्म विशेष के क्यों हैं यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकारी तंत्र और आंतरिक सुरक्षा को समर्पित संस्थान द्वारा बांग्लादेशी आमद को स्वीकार करते गोपनीय पत्र सोसल मीडिया पर देखे गए हैं ,हालंकि इसका सत्यापन नही है मेरे पास लेकिन अगर यह सत्य है तो समाधान ढूंढते हुए वजहों की जड़ तक पहुंचना जरूरी होगा। सरल गणितीय आंकड़ों को समझे तो संथाल के जिले जिनमे मुख्य रूप से पाकुड़ और साहेबगंज जहां बांग्लादेशी आमद अधिक हुई है सिर्फ पच्चीस वर्षों में 35त्न मुस्लिम आबादी के साथ मुस्लिम जिले बन जायेंगे पाकुड से सटी सीमा के पास कालियाचक की घटना को एक दशक पूरा नहीं हुआ और ऐसी घटनाएं अब पाकुड़ में होने लगी हैं और यह क्रम दस वर्षो के अंदर दर्जन भर और प्रखंड है जहां एक आम घटना हो जायेगी। संसद निशिकांत दुबे द्वारा सदन में उठाए गए प्रश्नों के साथ समधन के रूप में केंद्र शासित प्रदेश बनाने की मांग की गई है, इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है राजनीतिक दल द्वारा झारखंड की पहचान यहां के मूल आदिवासी के घटती हुई जनसंख्या की फिक्र और इस आधार पर राजनीति करने के बजाए एक समृद्ध परंपरा का संपोषण किया जाए।


