◆विधायक-मंत्री बनने के बाद भी नहीं बदला व्यवहार, पुराने दोस्तों से उसी आत्मीयता से मिलते रहे सुदिव्य कुमार सोनू
स्मृति शेष सुदिव्य कुमार सोनू
डॉ.सुमन सिंह
दुमका। राजनीति के शिखर तक पहुंचने के बाद अक्सर लोगों के जीवन में बहुत कुछ बदल जाता है। पद, प्रतिष्ठा और व्यस्तताएं रिश्तों और पुराने परिचयों के बीच दीवार खड़ी कर देती हैं। लेकिन दिवंगत शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू उन लोगों में थे, जिनके लिए बचपन की दोस्ती और पुरानी यादों की अहमियत आखिरी सांस तक बनी रही। दुमका से उनका रिश्ता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि उनके बचपन और स्कूली जीवन की स्मृतियों से भी गहराई से जुड़ा रहा।
सुदिव्य कुमार सोनू के बचपन के कुछ वर्ष दुमका में बीते। उनके पिता शम्भू नाथ शर्मा पीएचइडी में कार्यपालक अभियंता थे। अविभाजित बिहार के अलग-अलग जिलों में उनकी पदस्थापना रही। इसी क्रम में करीब तीन वर्षों तक वे दुमका में पदस्थापित रहे। उस दौरान पूरा परिवार दुमका के खूंटाबांध स्थित पीएचइडी विभाग के सरकारी क्वार्टर में रहता था।
सुदिव्य सोनू की स्कूली शिक्षा दुमका शहर के बाल भारती और जिला स्कूल में हुई। स्कूल में विनोद कुमार लाल और सुनील कोठरीवाल उनके सहपाठी रहे। स्कूल के दिनों में बनी दोस्ती समय के साथ और गहरी होती गई।बाद में सुदिव्य सोनू विधायक और फिर मंत्री बने। राजनीतिक जीवन में उनकी व्यस्तताएं बढ़ती गईं, लेकिन पुराने दोस्तों के साथ उनका रिश्ता कभी कमजोर नहीं पड़ा। विनोद लाल और सुनील कोठरीवाल के अनुसार, पद और कद बढ़ने के बावजूद सोनू के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। वे आज भी पुराने दोस्तों से उसी सहजता और आत्मीयता से मिलते थे, जैसे स्कूल के दिनों में मिला करते थे।
वर्ष 2008 में जब गुरुजी शिबू सोरेन दुमका केंद्रीय कारा में आजीवन कारावास की सजा काट रहे थे, तब सुदिव्य सोनू का दुमका आना-जाना काफी बढ़ गया था। गुरुजी के बरी होने तक वे लंबे समय तक दुमका में कैंप करते रहे। इस दौरान राजनीतिक गतिविधियों के साथ-साथ उनके पुराने दोस्तों से मिलने-जुलने का सिलसिला भी लगातार बना रहा।
पुराने साथी बताते हैं कि दुमका आने पर सोनू अपने स्कूल के दिनों को कभी नहीं भूलते थे। दोस्तों के घर जाना, बैठकर पुरानी बातें करना और हंसी-मजाक करना उनके स्वभाव का हिस्सा था।
वर्ष 2020 के दुमका विधानसभा उपचुनाव के दौरान भी सुदिव्य कुमार सोनू अपने पुराने मित्रों के घर पहुंचे थे। राजनीतिक माहौल और चुनावी व्यस्तताओं के बीच भी उन्होंने दोस्तों के लिए समय निकाला। पुराने साथियों के साथ बैठकर उन्होंने स्कूल के दिनों की यादें ताजा कीं।
सुनील कोठरीवाल और विनोद कुमार लाल बताते हैं कि विधायक और मंत्री बनने के बाद भी सुदिव्य सोनू के भीतर का वह पुराना ‘सोनू’ कभी नहीं बदला। वे खुले दिल से मिलते थे और पुराने दोस्तों के बीच किसी तरह की औपचारिकता नहीं रखते थे।
पुराने दोस्तों की यादों में सुदिव्य सोनू एक राजनेता से कहीं ज्यादा एक जिंदादिल इंसान के रूप में मौजूद हैं। उनके साथ बिताए बचपन के दिन, स्कूल की यादें और बाद के वर्षों में भी कायम रही दोस्ती आज उनके मित्रों की आंखों के सामने घूम रही है।
दोस्तों का कहना है कि सोनू के असमय निधन ने दुमका में उनके बचपन के साथियों को भीतर तक झकझोर दिया है। उनके लिए यह किसी राजनीतिक व्यक्ति का निधन भर नहीं, बल्कि अपने बचपन के एक साथी को खो देने जैसा है।
सुदिव्य सोनू के जाने से उनके पुराने दोस्तों के बीच अब उन मुलाकातों की यादें रह गई हैं, जिनमें पद और राजनीति कहीं पीछे छूट जाती थी और सामने होता था-बाल भारती स्कूल का वही पुराना ‘सोनू’, जो दोस्तों के बीच आज भी उतना ही अपना था।


