नई दिल्ली । सोशल मीडिया पर किसी सुरम्य पहाड़, शांत झील या अनछुए पठार की तस्वीर वायरल होने के कुछ ही महीनों में वहां पहुंचने वालों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि होती है। सड़कें बनती हैं, पार्किंग भर जाती है, होटल-होमस्टे और कैफे की कतारें लगती हैं, और पर्यटकों की भीड़ उस जगह को मस्ट विजिट बना देती है। लेकिन लोकप्रियता की अक्सर भारी कीमत चुकानी पड़ती है, जो कि तस्वीर में दिखाई नहीं देती। सूखते जलस्रोत, बढ़ते कचरे के ढेर, सीवेज का दबाव, ट्रैफिक जाम और लोकल जीवनशैली में आता बदलाव इस कहानी का दूसरा, अधिक गंभीर पहलू होता हैं जो कि अक्सर दिखाई नहीं देता है। यह समस्या किसी एक देश की नहीं, बल्कि दुनियाभर के कई लोकप्रिय पर्यटन स्थलों की सच्चाई बन चुकी है।
केरल के मदायिरप्परा में हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शन ने मुद्दे को फिर सुर्खियों में ला दिया है। जहां लोगों और पर्यावरणविदों ने दुर्लभ लेटराइट पठार को बढ़ते पर्यटन दबाव से बचाने की मांग की है। यह घटना इस बात पर जोर देती है कि पर्यटकों की संख्या भले ही अनंत लगे, लेकिन किसी पहाड़, झील या जंगल की सहने की क्षमता (कैरीइंग कैपेसिटी) सीमित होती है। पर्यटन अपने आप में बुरा नहीं है, यह लोकल रोजगार पैदा करता है और अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब पर्यटकों की संख्या उस जगह के प्राकृतिक संसाधनों, जैव विविधता और लोकल जीवन की क्षमता से अधिक हो जाती है। स्पेन के बार्सिलोना से लेकर इटली और ब्रिटेन के छोटे गांवों तक, लोग अब सवाल कर रहे हैं कि आखिर यह पर्यटन किसके लिए है?
भारत में मनाली, शिमला, ऋषिकेश, गोवा और अब उत्तराखंड के कई शांत पहाड़ी इलाकों में यही स्थिति है। बुनियादी ढांचा सड़कें, पानी, सीवेज, कचरा प्रबंधन इतनी बड़ी भीड़ का दबाव सहने में अक्सर अक्षम साबित होता है। दुर्भाग्यवश, हमारे यहां पर्यटन स्थलों के विकास में पहला सवाल अक्सर यह होता है कि कितने पर्यटक लाए जा सकते हैं? जबकि सही सवाल यह होना चाहिए कि यह जगह बिना नुकसान के कितने पर्यटकों को संभाल सकती है? पहाड़ी क्षेत्र, जलवायु परिवर्तन के दौर में भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं, ऐसे में अनियंत्रित पर्यटन जोखिम को और बढ़ा सकता है।
दुनिया के कुछ देशों ने समस्या को स्वीकार कर समाधान ढूंढने शुरू कर दिए हैं। भूटान इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है, जिसने लंबे समय से हाई वैल्यू, लो इम्पैक्ट पर्यटन नीति अपनाई है। वहां पर्यटकों से सस्टेनेबल डेवलपमेंट फीस ली जाती है, ताकि पर्यावरण और समाज पर अनावश्यक दबाव न पड़े। थाईलैंड का माया बे अत्यधिक पर्यटन से हुए नुकसान के बाद लंबे समय तक बंद रहा और फिर नियंत्रित तरीके से खोला गया।
भारत को भी इस सोच को अपनाना होगा। हर लोकप्रिय पर्यटन स्थल के लिए एक दिन में प्रवेश करने वाले पर्यटकों, गाड़ियों और निर्माण की संख्या तय करनी होगी। कुछ जगहों पर पर्यटकों की संख्या सीमित करनी पड़ सकती है, कहीं प्रवेश शुल्क बढ़ाना होगा, कहीं पारिस्थितिकी के आधार पर अस्थायी बंदी करनी होगी।


