विधायक और सांसद को दो-दो बार दिया आवेदन, फिर भी कोरे साबित हुए वादे, ग्रामीणों का फूटा गुस्सा
सड़क नहीं तो वोट नहीं- आदिवासियों ने कुल्ही दुरुप कर किया चुनाव बहिष्कार का बड़ा ऐलान
ब्यूरो
दुमका। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच दुमका के रानीश्वर प्रखंड का छोटा गुलामशुली टोला आज भी अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। पक्की सड़क के अभाव में वर्षों से नारकीय जीवन जी रहे यहां के 57 आदिवासी परिवारों का सब्र अब टूट चुका है। सड़क निर्माण की लगातार हो रही अनदेखी से आक्रोशित ग्रामीणों ने गांव में ‘कुल्ही दुरुप’ (पारंपरिक बैठक) कर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ग्रामीणों ने एक स्वर में दो टूक ऐलान कर दिया है कि जब तक सड़क नहीं बनेगी, तब तक वे आगामी किसी भी चुनाव में मतदान नहीं करेंगे। गांव मुख्य रूप से दो टोलों में बंटा है; बड़ा गुलामशुली और छोटा गुलामशुली, जिनके बीच करीब डेढ़ से दो किलोमीटर की दूरी है। लगभग 20 साल पहले यहां बोल्डर बिछाने का काम हुआ था, लेकिन आज इस रास्ते पर पैदल चलना भी किसी जंग से कम नहीं है।
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मरीजों को खटिया पर ढोने की मजबूरी
सड़क न होने का सबसे बड़ा खामियाजा गांव के मरीजों और गर्भवती महिलाओं को भुगतना पड़ता है। गांव तक न तो कोई एंबुलेंस पहुंच पाती है और न ही कोई चारपहिया वाहन। आपात स्थिति में मरीजों को खाट (खटिया) पर लादकर डेढ़ से दो किलोमीटर दूर बड़े गुलामशुली तक ले जाना पड़ता है, तब जाकर उन्हें अस्पताल ले जाने के लिए गाड़ी मिल पाती है। जर्जर रास्ते के कारण डॉक्टर भी गांव आने से कतराते हैं, जिससे कई बार स्थिति जानलेवा हो जाती है।
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शिक्षा और शादी-विवाह पर भी पड़ रहा असर
पक्की सड़क के अभाव का असर सिर्फ स्वास्थ्य सुविधाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों की पढ़ाई भी इससे बुरी तरह प्रभावित हो रही है। बरसात के दिनों में खराब रास्ते के कारण बच्चों का स्कूल जाना मुश्किल हो जाता है। वहीं, सड़क की यह बदहाली अब गांव के युवाओं के वैवाहिक जीवन में भी रोड़ा बन रही है। ग्रामीणों ने बताया कि जब टोले में शादी होती है, तो बरातियों की गाड़ियां दो किलोमीटर दूर ही खड़ी करनी पड़ती हैं और लोगों को पैदल गांव आना पड़ता है। ऐसे में कई बार इस टोले में बेटे-बेटियों का रिश्ता तय करने में भी भारी फजीहत का सामना करना पड़ता है।
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नेताओं के कोरे आश्वासन से नाराज, किया वोट बहिष्कार का ऐलान
ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि चुनाव के वक्त नेता बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन जीतते ही जनता की समस्याएं उन्हें नजर नहीं आतीं। दुमका के सांसद नलिन सोरेन और शिकारीपाड़ा के विधायक आलोक कुमार सोरेन को सड़क निर्माण के लिए दो-दो बार आवेदन दिया जा चुका है, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई। पिछले विधानसभा चुनाव में विधायक ने खुद गांव आकर जीत के बाद सड़क बनवाने का आश्वासन दिया था, जो आज तक पूरा नहीं हुआ। अब ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सहित जिला प्रशासन से तत्काल स्थल निरीक्षण कर निर्माण शुरू कराने की मांग की है। कुल्ही दुरुप में दिनेश सोरेन, गंगा टुडू, अनिल मुर्मू, लखन टुडू, चुड़की किस्कू सहित बड़ी संख्या में मौजूद ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि 57 आदिवासी परिवारों का यह संघर्ष अब रुकने वाला नहीं है।


