एस.के.झा.’सुमन’
दुमका। जहाँ एक ओर देश की संसद में शुक्रवार को 131वां संविधान संशोधन विधेयक ‘विशेष बहुमत’ के फेर में उलझकर दम तोड़ गया, वहीं बाबा बासुकीनाथ की पावन धरा और झारखंड की उपराजधानी दुमका की प्रबुद्ध महिलाओं में इसे लेकर गहरी टीस और आक्रोश है। नारी शक्ति की राह में आए इस विधायी अवरोध को यहाँ की महिलाओं ने केवल एक बिल का गिरना नहीं, बल्कि ‘आधी आबादी’ के सपनों पर ब्रेक लगना बताया है। शहर की जानी-मानी शिक्षाविदों, समाजसेवियों और वकीलों ने इस घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि परिसीमन और जनगणना जैसे तकनीकी पेचों को ढाल बनाकर महिलाओं के हक को टालना दुर्भाग्यपूर्ण है।
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अधूरी रही आधी आबादी की आस: शहर की विदुषी ने जताया गहरा क्षोभ
विपक्ष द्वारा ‘कोटे के भीतर कोटा’ की मांग सिर्फ सियासी । यह पिछड़ों के उत्थान की नहीं, बल्कि समाज को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटने की कोशिश है। महिला सिर्फ महिला होती है जाति नहीं। प्रतिपक्ष ऐतिहासिक अवसर को खोया।
किरण तिवारी अधिवक्ता
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विपक्ष के नकारात्मक रवैये ने आधी आबादी की उम्मीदों को तोड़ा है। लोकतंत्र के मंदिर में न्याय की यह हार निराशाजनक है।
नीतू कुमारी, अधिवक्ता, दुमका
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विपक्षी दलों ने महिलाओं के सशक्तिकरण के बजाय अपने राजनीतिक स्वार्थ को प्राथमिकता दी है। यह ऐतिहासिक अवसर था, जिसे विपक्ष ने गंवा दिया।
दीपिका मुर्मू, अधिवक्ता दुमका।
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विपक्ष का महिला समर्थन’ का नकाब उतर गया है। वे महिलाओं को बराबरी का हक देने से डरते हैं।
सीमा कुमारी, वार्ड पार्षद 15, दुमका
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महिला आरक्षण विधेयक पारित ना होना अधुरे लोकतंत्र को दर्शाता है, आधी आबादी की आवाज दबाकर समानता, प्रतिनिधित्व और न्याय पर गंभीर आघात हुआ है।
*डॉ0 होलिका कुमारी मरांडी, असिस्टेंट प्रोफेसर,संप महाविद्यालय, दुमका।


