संताल एक्सप्रेस संवाददाता
साहिबगंज – लोकसभा में केंद्र सरकार के द्वारा पेश किए गये महिला आरक्षण बिल जादुई आंकड़ा पार नही किये जाने के कार बिल अटक गया.या कहे तो महिला आरक्षण बिल पास नही हो पाया.जिसके कारण आधी आबादी का बिल अधर में लटक गया.मिली जानकारी के अनुसार महिला आरक्षण बिल को पास कराने के लिए सरकार 352 के जादुई आंकड़े के बजाय सिर्फ 298 वोट जुटा पाई.वही महिला आरक्षण बिल के पास नही होने पर आम महिलाएं किसे दोषी मानती है इस विषय पर प्रस्तुत है साहिबगंज की महिलाओं की प्रतिक्रियाएं.
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1.आजादी के दशकों बाद भी महिला सशक्तिकरण के विशेष कर राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने का प्रयास कांग्रेस की सरकार ने ईमानदारी से नहीं किया. एनडीए की सरकार में महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा में लाया गया. किंतु अपरित नहीं हो सका और एक बार पुनः महिला आरक्षण विधेयक ठंडा बस्ते में चला गया. महिलाओं के हक के लिए अधिकार जरूरी है. राजनीतिक रूप से सशक्त महिला ही सशक्त राष्ट्र के निर्माण में सहायक हो सकेंगे विपक्षी दलों का रवैया महिलाओं को आरक्षण देने के प्रति उदार नहीं है. भविष्य में जिसका घाटा विपक्षी दलों को उठाना पड़ेगा. लोकसभा के प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी का तर्क से सहमत होना आसान नहीं है.
प्रमिला सोरेन ,साहित्यकार
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2.महिला आरक्षण विधेयक पारित नहीं हो सका. महिलाओं के राजनीति में सशक्त भागीदारी के लिए जो विधेयक लोकसभा में लाया गया था वह संख्या बल के आधार पर पारित नहीं किया जा सका. महिलाओं को राजनीतिक शक्ति प्रदान कर देश में सशक्त बदलाव का बीड़ा भारतीय जनता पार्टी ने उठाया है. संख्या बल के आधार पर विधेयक विधायक पारित नहीं हो सका. किंतु विरोधी दलों की मनसा महिला आरक्षण विधेयक को लेकर ठीक नहीं है. प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इसके प्रति जो रवैया दिखाया है. वह महिलाओं के हक और अधिकार के विपरीत है.
गीता पाण्डेय, सेवानिवृत शिक्षिका
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3.लोकसभा में महिला बिल पारित नहीं होने को लेकर हम सभी महिलाएं बहुत दुखी हैं. राजनेताओं को यह जानना जरूरी है कि आज के समय में महिलाएं किसी से कम नही है. महिलाएं पुरुष से कम से कदम मिलाकर हर वह काम कर सकती है. सभी राजनेता बराबरी के हक की बात करते हैं. लेकिन महिला बिल पास नहीं होना उनके चरित्र को उजागर कर रहा है.
बिभा मिश्रा
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4.महिला बिल पास नहीं होना अत्यंत दुःखद है. इसके लिए सीधे तौर पर राजनेता जिम्मेदार हैं. आज महिलाएं किसी से कम नहीं है. हर क्षेत्र में हम लोग बराबरी कर रहे हैं. लेकिन जब हमारे हक की बात होती है तो सभी लोग मिलकर पीछे धकेलना का काम करते हैं. हम अभी भी बहुत पीछे हैं. विश्व के अन्य देशों से इसके पीछे भी यही कारण है कि यहां की महिलाओं को पीछे रखा जा रहा है.
शाम्भवी सिंह
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5.महिला आरक्षण बिल लंबे समय तक भारतीय राजनीति में चर्चा का विषय रहा. लेकिन यह कई बार लोकसभा में पारित नहीं हो पाया. इसके लिए किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं है. बल्कि इसके पीछे कई कारण और पक्ष जिम्मेदार हैं. सबसे पहले विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच इस बिल को लेकर सहमति का अभाव रहा. कुछ दल इसका समर्थन कर रहे थे. जबकि कुछ ने इसमें संशोधन की मांग रखी.जिससे एकमत निर्णय नहीं बन सका.
दूसरा, सत्ता पक्ष यानी सरकार की ओर से भी इस बिल को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं दी गई.कई बार सरकार ने इसे गंभीरता से आगे बढ़ाने में ढिलाई दिखाई. तीसरा विपक्षी दलों ने भी अपने-अपने हितों और शर्तों के कारण इस बिल का विरोध किया या उसे रोकने का प्रयास किया.
चौथा संसद के अंदर कई बार हंगामा और व्यवधान उत्पन्न हुए जिसके कारण बिल पर शांतिपूर्वक चर्चा नहीं हो सकी और प्रक्रिया अधूरी रह गई. पांचवां समाज में भी इस बिल को लेकर मतभेद थे. कुछ लोगों का मानना था कि इसमें सभी वर्गों, विशेषकर पिछड़े वर्ग की महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा.
इसके अलावा, गठबंधन राजनीति भी एक महत्वपूर्ण कारण रही. जहां सरकार को अपने सहयोगी दलों को साथ लेकर चलना पड़ता है. जिससे निर्णय लेना कठिन हो जाता है. इन सभी कारणों से यह बिल बार-बार अटकता रहा.
अतः निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि महिला आरक्षण बिल के पारित न होने के लिए कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार नहीं है. बल्कि राजनीतिक दलों की असहमति, सरकार और विपक्ष की भूमिका, संसदीय व्यवधान और सामाजिक मतभेद सभी मिलकर इसके लिए जिम्मेदार रहे हैं.
रेणु गुप्ता शिक्षिका


