राज्य और राजनीति
चंदन मिश्र
झारखंड विधानसभा चुनाव की बिसातें बिछनी शुरू हो गई हैं। सत्ता पक्ष अपनी ओर से वोटरों को लुभाने के लिए सौगातों की बरसात कर रहा है, वहीं विपक्ष भी मुद्दों के तीर इकट्ठे करने में जुटा है। विपक्ष का एनडीए गठबंधन सीटों के तालमेल को अंतिम रूप देने में जुटा है। सत्तापक्ष की ओर से अभी इसकी शुरुवात नहीं हुई है। यह सारी सियासी कवायद पर आगे विस्तार से चर्चा होगी। आज हम झारखंड के जाति समुदाय के वोट बैंक और वोटरों के समीकरण पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
झारखंड कहने को तो जनजातीय प्रदेश कहलाता है, लेकिन यहां जनजातियों से कहीं ज्यादा गैर जनजाति (सदान) समुदाय के लोग रहते हैं। यहां 26 प्रतिशत जनजातीय समुदाय की आबादी है, जबकि 78 प्रतिशत गैर जनजातीय लोग रहते हैं। हालांकि इनमें से बड़ी संख्या दूसरे प्रांत से आए लोग रहते हैं। झारखंड में 14 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 40 फीसदी से ज्यादा अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग हैं। इनमे कुर्मी जाति सबसे अधिक हैं। यहां 25 फीसदी से ज्यादा कुर्मी समुदाय के लोग हैं। यानी सबसे बड़ा वोट बैंक कुर्मियों का है। साथ ही कुर्मी जाति की राजनीतिक क्षेत्र में सबसे सजग और सक्रिय भूमिका रही है। झारखंड की राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय राजनीतिक दलों में इनकी अग्रणी भूमिका रही है। भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा, आजसू पार्टी, जदयू के अलावा वामदलों में भी कुर्मी नेता अग्रणी भूमिका में रहे हैं। आजसू पार्टी की पिछले ढाई दशक से एक कुर्मी नेता अगुवाई कर रहे हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा में भी कुर्मी नेताओं की अहम भूमिका रही है। इस पार्टी की बुनियाद ही महतो मांझी समीकरण के तहत खड़ी की गई थी। विनोद बिहारी महतो और शिबू सोरेन इसके प्रणेता रहे हैं। भुवनेश्वर मेहता कुर्मी समुदाय से आते हैं और वह लंबे समय तक
सीपीआई के झारखंड के प्रदेश सचिव रहे। भाजपा में भी कुर्मी नेताओं का लंबे समय तक बोलबाला रहा है। रामटहल चौधरी लंबे समय तक रांची के सांसद रहे। उनका प्रभाव रांची के अलावा राज्य के कई क्षेत्रों में रहा। जमशेदपुर के सांसद विद्युतवरण महतो लगातार कई वर्षों से सांसद बने हुए हैं। भाजपा संगठन में बड़ी संख्या में कुर्मी नेता शीर्ष पदों पर बने हुए हैं।
लोकसभा चुनाव के समय नौजवानों का एक संगठन झारखंडी भाषा संघर्ष समिति खड़ा हुआ था। जयराम महतो इसके अगुवा थे। राज्य के आठ लोकसभा क्षेत्रों से इस संगठन के उम्मीदवार चुनाव लड़ने के लिए खड़े हुए थे। इनमें अधिकतर कुर्मी जाति के उम्मीदवार थे। इन्होंने बड़ी पार्टियों को अच्छी चुनौती दी थी। इस बार भी कुर्मी के जिस नेता का सबसे अधिक अपने वोटरों पर प्रभाव होगा, वोटरों को अपनी ओर खींचेगा और अपने दल या गठबंधन को ज्यादा से ज्यादा कुर्मी वोट दिलाएगा, वही सत्ता की कुर्सी पर बैठने की दावेदारी करेगा। यही देखना दिलचस्प होगा कि अगले चुनाव में कुर्मी वोटर किस दिशा में जाते दिखेंगे।
दो दर्जन विधानसभा क्षेत्र कुर्मी प्रभावित
झारखंड के रांची में 17, जमशेदपुर में 11, गिरिडीह में 19, हजारीबाग में 15 तथा धनबाद में 14 फीसदी कुर्मी जाति के वोटर हैं। लिहाजा इनका चुनावी राजनीति पर बहुत अधिक दबदबा और प्रभाव है।
झारखंड के लगभग दो दर्जन से ज्यादा विधानसभा क्षेत्रों में कुर्मी जाति के वोटरों का अच्छा खासा प्रभाव है। उम्मीदवारों की हार जीत का फैसला इनके ही हाथों होता है। इनमें से प्रमुख रूप से रांची से सटे हटिया, कांके, खिजरी, सिल्ली, ईचागढ़, जमशेदपुर, रामगढ़, हजारीबाग के बड़कागांव, बरकट्ठा, मांडू, धनबाद के टुंडी, बाघमारा, सिंदरी, बोकारो के बेरमो,गोमिया, बोकारो, गिरिडीह जिला के गिरिडीह, डुमरी, गांडेय, धनवार प्रमुख विधानसभा क्षेत्र हैं।
झारखंड में कौन कौन कुर्मी नेता प्रभावशाली
झारखंड में विभिन्न दलों में कई कुर्मी नेता प्रभावशाली हैं। इन नेताओं का अपनी पार्टी के साथ साथ वोटरों पर भी अच्छा खासा प्रभाव है। इनमें आजसू पार्टी के अध्यक्ष सुदेश महतो, आजसू पार्टी के उपाध्यक्ष और सांसद चंद्र प्रकाश चौधरी, भाजपा के सांसद विद्युत वरण महतो, पूर्व सांसद रामटहल चौधरी, झारखंड मुक्ति मोर्चा के मथुरा महतो, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, जदयू के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद खीरू महतो, नवगठित पार्टी के प्रमुख जयराम महतो कुछ प्रमुख नाम हैं। सुदेश महतो के अलावा कुर्मी समुदाय का फिलहाल कोई ऐसा चेहरा नहीं है, जिनका राज्यव्यापी पहचान और प्रभाव हो। जयराम महतो पनी पहचान बनाने की पूरी कोशिश अपने समुदाय में कर रहे है। आने वाले समय में वे सुदेश महतो जैसे स्थापित कुर्मी नेता को कड़ी चुनौती भी दे सकते है। जयराम महतो का कुर्मी युवाओं पर कुछ क्षेत्रों में अच्छा खासा प्रभाव देखने को मिल रहा है।
कौन बनेगा कुर्मी नेता
झारखंड का आगामी विधानसभा चुनाव राज्य को एक कुर्मी नेता को भी स्थापित करेगा। अभी तक के जीतने नाम सामने आए हैं, इनमें से एक को छोड़कर कोई नेता ऐसा नहीं है जो अभी तक राज्यव्यापी पहचान बना पाया है। 2024 के विधानसभा चुनाव में जिस नेता के नेतृत्व में विधानसभा की ज्यादा सीटें और वोट आयेंगे, जाहिर है वही नेता झारखंड में कुर्मियों का सबसे बड़ा नेता होगा। सत्ता के नए समीकरण में भी उसकी भूमिका बड़ी होगी।
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