शेखर सुमन
देवघर। जिले के सारठ प्रखंड क्षेत्र में जागृत सती स्थल के रूप में प्रसिद्ध कुकराहा दुर्गा मंदिर में आज भी मध्यरात्रि की नीरवता को भंग करते हुए घुंघरू के मद्धिम स्वर सुनाई पड़ती है। बताया जाता है कि घुंघरू के स्वर ऐसे प्रतीत होते है मानों कई स्त्रियां नृत्य कर रही हो।जीवन की सभी प्रतिकूल परिस्थितियों से छुटकारा दिलाने वाली शांति एवं शक्ति की दात्री महामाया जगदम्बा की भव्य मंदिर सारठ प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत कुकराहा गांव के मध्य में स्थित है।भक्तजनों एवं श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान सभी तीर्थों से बढ़कर है।इस प्रसिद्ध मां दुर्गा मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां से कोई भी भक्त गण कभी निराशा नहीं गया है,और न ही जाएगा।माता के भक्तों में समाज के हर वर्गों के लोग हैं जो माता की असीम कृपा से अपने अपने क्षेत्र में मानव एवं समाज सेवा में जुटे हुए हैं।कुछ वर्षों पूर्व उड़ीसा में रह रहे माता के एक वैज्ञानिक भक्त के साथ आए विशेषज्ञों की एक टीम ने माता के दर्शन कर इस स्थान को सकारात्मक ऊर्जा का महाश्रोत बताया था।तथा विशेषज्ञों की टीम ने यह भी कहा था कि यह सकारात्मक ऊर्जा दृश्य नहीं है।जिसे वैज्ञानिक हाटमेंट अनसर्ट द्वारा आविष्कृत ऊर्जामापी यंत्र आवे एंटीना द्वारा मापकर उसकी मात्रा निकाली जा सकती है।इस विशेषज्ञों की टीम के अनुसार तिब्बती मंदिर,चर्च के क्रास शिवलग तथा ओम् की ऊर्जा से भी इस मंदिर में उत्साजिर्त अदृश्य ऊर्जा अधिक है।सिंगापुर, लंदन,ब्राजील आदि स्थानों पर रह रहे इस क्षेत्र के भक्तगण दूर्गा पूजा में एक बार यहां आकर माता की पूजा आराधना अवश्य करते हैं।इन भक्तों का मानना है कि यह मंदिर अवसाद रूपी महाव्याधि का सर्वोत्तम उपचार स्थल है।दूर्गा पूजा आरम्भ होते ही इस मंदिर में प्रतिदिन मनौती पूरे हुए भक्तगण सैकड़ों ब्राह्मणों एवं कन्याओं को भोजन कराते हैं। विद्वान पंडितों जटाधारी एवं गेरूआ वस्त्र धारी साधु संतों का यहां दसों दिन जमघट लगा रहता है।इस मंदिर की विशेषता है कि माता के भक्तगण एवं श्रद्धालु सालभर तो माता के रूप से इनकी पूजा अर्चना करते है लेकिन दशहरा के दस दिन लाड़ली के रूप में इनकी सेवा करते हैं।यही कारण है कि अजय नदी ससुराल से सप्तमी तिथि को जब केले के थम में श्वेत वस्त्र लपेटकर इन्हें लाया जाता है उस समय सैकड़ों नर नारी, आबाल,वृद्ध, युवक,युवतियां लाड़ली पुत्री के मैके आने की खुशियां मनाते हैं।वहीं विजया दशमी के दिन इनके विसर्जन विदाई के वक्त हजारों आंखें बेटी की विदाई के गम में नम हो जाती है।माता के श्रद्धालुगण बताते है कि यह मंदिर अपने आप में अनोखा अद्वितीय तथा बेहद रहस्यपूर्ण है। माता के पावन नाम ही निराशा के सागर में गोते लगाते हुए लोगों के लिए अचुक औषधि है।
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