राज्य और राजनीति
चंदन मिश्र
झारखंड वर्ष 2000 में बना। राज्य बने आज 26 साल हो गए। राज्य में अकूत खनिज संपदा है, पर उच्च शिक्षा में हम देश में सबसे नीचे – 28वें नंबर पर खड़े हैं।
झारखंड में 1.2 लाख आबादी पर एक विश्वविद्यालय है। देश का औसत 1 विश्वविद्यालय 1.8 लाख आबादी पर है। झारखंड का आज अपने पड़ोसी राज्यों से भी खराब हाल है। राज्य में कुल 12 सरकारी विश्वविद्यालय हैं। इनके अलावा पांच निजी, एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है। रांची विश्वविद्यालय, एसपीएम विश्वविद्यालय, विनोबा भावे विश्वविद्यालय, नीलांबर पीतांबर विश्वविद्यालय, कोल्हान विश्वविद्यालय, सिदो कान्हू मुर्मू दुमका और विश्वविद्यालय बीबीएमकेयू है।
300 से ज्यादा कॉलेज, पर 90 प्रतिशत में स्थायी प्रिंसिपल नहीं, प्रभारी से चल रहे हैं। ग्रॉस एनरोलमेंट से 23 – 18-23 साल के कितने युवा कॉलेज जाते हैं – झारखंड में 19.प्रदर्शित – राष्ट्रीय औसत 28.4 प्रतिशत – यानी 100 में से 81 युवा कॉलेज ही नहीं जाते। आदिवासी युवाओं में सिर्फ 12.3 प्रतिशत होती थी।
शिक्षक नहीं कोई।
रांची विश्वविद्यालय में 450 पद स्वीकृत, 180 खाली हैं। विनोबा भावे हजारीबाग में 380 में 210 खाली हैं। नीलांबर-पीतांबर पलामू में तो 70 प्रतिशत पद खाली हैं। मुताबिक – पूरे झारखंड में 2100 सहायक प्रोफेसर के पद खाली, पिछले 5 साल में सिर्फ 450 की नियुक्ति।
नतीजा – एक शिक्षक 3-3 विषय पढ़ा रहा है। जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज में इतिहास का शिक्षक भूगोल पढ़ा रहा है।
सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय दुमका – 2021 में एडमिशन, 2024 में फर्स्ट ईयर का एग्जाम, 2026 में भी ग्रेजुएशन पूरा नहीं।
कोल्हान विश्वविद्यालय – 2022-25 सत्र अभी 2026 में चल रहा है। छात्र तीन साल की डिग्री के लिए 5 साल इंतजार करता है, फिर नौकरी की उम्र निकल जाती है।
जमशेदपुर के कई डिग्री कॉलेज में 2010 के बाद से लैब में केमिकल नहीं आया।
रांची के मांडर कॉलेज में लाइब्रेरी में 2018 से नई किताब नहीं मिली है। वाई-फाई, स्मार्ट क्लास तो दूर, कई कॉलेज में बिजली भी दिन में चार घंटे ही मिलते हैं।
झारखंड का बजट 1.45 लाख करोड़, उच्च शिक्षा का बजट सिर्फ 1400 करोड़ यानी 1 प्रतिशत से भी कम है।
उसी बजट में मईया सम्मान योजना के लिए 15000 करोड़ और अबुआ आवास योजना के लिए 10000 करोड़ का प्रावधान है।
सत्ताधारी दलों को वोट महिला और अबुवा आवास पानेवाले लाभुकों से मिलता है, कॉलेज से नहीं। इसलिए कॉलेज के विकास की जगह योजनाओं पर पैसा खर्च किया जाता है।
पिछले 10 साल में 3 बार जेपीएससी से सहायक प्रोफेसर की भर्ती निकली, दो बार पेपर लीक, एक बार कोर्ट में अटकी।
2023 में 260 पदों के लिए 45 हजार आवेदन, परीक्षा हुई, रिजल्ट आया, पर ओबीसी आरक्षण पर विवाद, कोर्ट ने रोक लगा दी, आज तक ज्वाइनिंग नहीं।
कुलपति की नियुक्ति भी लेट लतीफी का शिकार होता रहा है। इसमें भी राजभवन बनाम सरकार का मामला आमने सामने होता रहा है। रांची विश्वविद्यालय में दो साल के बाद स्थायी कुलपति की नियुक्ति हुई है।
झारखंड का जो युवा थोड़ा पढ़ा-लिखा, वो बाहर।
रांची से हर साल 20 हजार छात्र दिल्ली, भुवनेश्वर, बेंगलुरु जाते हैं – कोचिंग, कॉलेज के लिए।
जो ग्रेजुएट होता है, वो नौकरी के लिए रांची छोड़ देता है।नतीजा – झारखंड के कॉलेज में वही रह जाता है, जिसके पास बाहर जाने का पैसा नहीं।
संताली, मुंडारी, हो भाषा में उच्च शिक्षा में एक भी किताब नहीं। बच्चा 10वीं तक संताली में पढ़ता है, 12वीं के बाद अचानक अंग्रेजी-हिंदी, ड्रॉप आउट हो जाता है।
कई कॉलेजों में होस्टल नहीं हैं। रांची विश्वविद्यालय में एसटी होस्टल में 100 सीट है, जबकि आवेदन 800 छात्रों का जमा होता है।
स्कॉलरशिप लेट होता है। पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप 2024-25 की अक्टूबर 2026 तक नहीं आई। छात्र उधारी लेकर पढ़ रहा है। विश्वविद्यालयों एवं कॉलेजों में
अतिथि शिक्षक हैं। 8 साल से 15000 रुपये में पढ़ा रहे हैं। ये शिक्षक एनईटी पास, पीएचडी किए हैं। बोले – “सरकार स्थायी नहीं करती, क्योंकि अतिथि सस्ता पड़ता है”।
2100 पद खाली, एक साथ जेपीएससी नहीं, विश्वविद्यालय स्तर पर वॉक-इन, पीएचडी धारकों को सीधा नियुक्ति, जैसे छत्तीसगढ़ ने किया। हर विश्वविद्यालय को 31 मार्च तक परीक्षा, 30 जून तक रिजल्ट – कानून बनाना होगा, नहीं तो अनुदान रोकनी होगी।
संताली, मुंडारी, कुडुख में स्नातक स्तर पर किताबें, जैसे ओडिशा ने संताली में की।
मईया सम्मान जरूरी, पर उच्च शिक्षा के बिना मैया का बच्चा फिर मजदूर ही बनेगा। बजट 1400 से 4000 करोड़ करना होगा। झारखंड में खदान से कोयला निकलता है, पर कॉलेज से ग्रेजुएट नहीं निकलता।
24 साल में हमने 12 विश्वविद्यालय बनाए, पर 12 विश्वस्तरीय शिक्षक नहीं बनाए।
अगर उच्च शिक्षा बेहाल रही तो झारखंड के युवा का भविष्य दो ही होगा – या तो रांची से बाहर पलायन, या खदान में मजदूरी।
सरकार चाहे झामुमो की हो या भाजपा की, दोनों ने कॉलेज को वोट बैंक नहीं समझा, इसलिए हाल बेहाल है।
और जब तक कॉलेज में क्लास नहीं लगेगी, झारखंड में विकास की क्लास भी नहीं लगेगी।


