-श्याम किशोर चौबे
झारखंड विधानसभा चुनाव 2024 का स्पष्ट संदेश है, हेमंत जीते, हिमंता हारे। इस चुनाव में तमाम सर्वेक्षणों और अनुमानों के विपरीत इंडिया ब्लॉक ने 56 सीटें जीतकर शानदार सफलता हासिल की। दूसरी ओर एनडीए 2019 के मुकाबले भी पीछे चला गया। भाजपा की कुल जमा 21 भागीदारी के साथ वह 24 सीटों पर सिमट गया, जबकि 2019 में अकेले भाजपा 25 सीटें जीती थी। एक उपचुनाव लेकर आजसू को तीन सीटें मिली थीं और बाद में बाबूलाल मरांडी और उसके भी बाद कमलेश सिंह, सीता मुर्मू, चंपाई सोरेन, अमित कुमार यादव और दिनेश विलियम मरांडी के भाजपा में तथा सरयू राय के जदयू में शामिल हो जाने से एनडीए का संख्या बल 35 हो गया था। चुनावी फलित कह रहा है कि इस बार इंडिया ब्लॉक की लहर थी, जिसके हीरो मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी धर्मपत्नी विधायक कल्पना सोरेन थे। एक फलित यह भी है कि अगले कम से कम दो राज्यसभा चुनावों में भाजपा झारखंड से अपना प्रतिनिधि नहीं भेज पाएगी।
जदयू, एलजीपी-आर आदि के नेताओं को छोड़ भी दें तो एनडीए फोल्डर से भाजपा के बड़े नेता, मसलन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, पार्टी प्रमुख जेपी नड्डा, कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, छह राज्यों असम, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश और हरियाणा के मुख्यमंत्री चुनाव प्रचार के लिए आए। खुद झारखंड के चार पूर्व मुख्यमंत्री लगे रहे। पांचवें पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास, जो ओड़िशा के राज्यपाल हैं, भी किसी न किसी बहाने जमे रहे। इन सभी ने बांग्लादेशी घुसपैठ और ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ जैसे मुद्दों को उछाला। जवाब में झामुमो की ओर से फिकरा कसा गया, न बटेंगे, न कटेंगे, भाजपा को कूटेंगे। यह फिकरा चल निकला। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा को भाजपा ने झारखंड का सह चुनाव प्रभारी बनाया था। हालांकि उन्होंने खूब मिहनत की, साम, दाम, दंड, भेद की रणनीति पर जबर्दस्त अमल किया। उन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठ, लव जिहाद और लैंड जिहाद जैसे जुमले से पूरे झारखंड को मथ डाला। यह चुनाव हेमंत बनाम हिमंता उछाला गया। लेकिन हेमंत की ऐतिहासिक जीत हुई और हिमंता हार गये। मोदी की गारंटी नहीं चली और हेमंत है तो हिम्मत है, ही चला। हिम्मत की इसी नाव पर कांग्रेस, राजद और माले भी पार उतर गये। खासकर, राजद की जीत अप्रत्याशित रही। उसने बता दिया कि झारखंड से उसके पांव उखड़े नहीं हैं। चार सीटें ही सही लाकर, पलामू से संताल परगना तक उसका डंका बज गया।
भाजपा के बड़े नेता जिस प्रकार पूरे झारखंड में छा गये थे, उससे स्थानीय नेताओं का कद छोटा दिखने लगा था। परिणामतः पब्लिक कनेक्ट न हो सका। एनडीए फोल्डर में महिला कनेक्ट के लिए एक भी नेत्री नहीं थी, जबकि आठ-नौ महीने पहले राजनीतिक पटल पर विराजीं कल्पना सोरेन ने अकेले दम लगभग एक सौ सभाएं कर महिलाओं पर खूब प्रभाव डाला। साल भर पहले जिस प्रकार मध्यप्रदेश में लाडली बहना योजना ने महिलाओं को मोहित किया था, उसी प्रकार झारखंड में मंईयां सम्मान योजना ने पर्याप्त असर डाला। राज्य की कुल जमा 81 विधानसभा सीटों में से 29 पर महिला वोटरों की अधिकता, अधिकतर सीटों पर बढ़े मतदान और महिला वोटरों का उमड़ना साफ संदेश दे रहा था कि जीत इंडिया ब्लॉक की ही होगी। महाराष्ट्र में एनडीए की प्रचंड जीत में वहां की महायुति सरकार द्वारा घोषित लाड़की-बहिना योजना का आकर्षण परिलक्षित होता है। अंतिम बात यह कि इस बार के चुनाव/उपचुनाव में मतदाताओं ने एकतरफा रूझान दिखाया। झारखंड और महाराष्ट्र का चुनाव हो कि उत्तरप्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल का उपचुनाव हर जगह एकतरफा वोटिंग ने तमाम सर्वेयरों और विश्लेष्कों को धत्ता बता दिया।
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