नई दिल्ली । जिंदगी में अच्छी नौकरी, पर्याप्त पैसा और तमाम सुविधाएं होने के बावजूद कई लोग मानसिक खालीपन और बेचैनी महसूस करते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब जिंदगी में सब कुछ है, तो सुकून क्यों नहीं मिल रहा? इस बारे में मनोविज्ञान का कहना है कि खुशहाल जीवन का संबंध केवल आर्थिक सफलता से नहीं, बल्कि हमारी सोच, रिश्तों और रोजमर्रा की आदतों से भी जुड़ा होता है। अक्सर लोग अपनी जिंदगी की तुलना दूसरों से करने लगते हैं। सोशल मीडिया पर दूसरों की उपलब्धियां, घूमने-फिरने की तस्वीरें और खुशहाल पल देखकर उन्हें अपनी जिंदगी अधूरी लगने लगती है। जबकि सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति के जीवन का केवल एक हिस्सा दिखाई देता है। उसकी परेशानियों और संघर्षों की जानकारी अक्सर सामने नहीं आती। इसलिए दूसरों से तुलना करने के बजाय अपनी उपलब्धियों और व्यक्तिगत विकास पर ध्यान देना चाहिए। जीवन में संतुष्टि बढ़ाने के लिए छोटी-छोटी खुशियों को महत्व देना भी जरूरी है।
परिवार का साथ, दोस्तों से बातचीत, अच्छा स्वास्थ्य और दिनभर के छोटे सकारात्मक अनुभव हमारी खुशहाली में योगदान देते हैं। आभार व्यक्त करने की आदत भी इसमें मददगार हो सकती है। इसके लिए रात को सोने से पहले दिन की तीन अच्छी बातें लिखने की शुरुआत की जा सकती है। इससे ध्यान उन चीजों पर भी जाता है, जो जीवन में पहले से मौजूद हैं। रिश्तों को समय देना मानसिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। हार्वर्ड स्टडी ऑफ एडल्ट डेवलपमेंट के दीर्घकालिक शोध में अच्छे रिश्तों को खुशी और बेहतर स्वास्थ्य से जुड़ा महत्वपूर्ण कारक पाया गया है। व्यस्त दिनचर्या के बीच परिवार के साथ बैठना, दोस्तों से बात करना और अपनी भावनाएं साझा करना मानसिक दबाव कम करने में मदद कर सकता है।
इसके लिए रोजाना कुछ समय मोबाइल से दूर रहकर अपनों के साथ बिताना उपयोगी है। खुद से हर समय बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद करना भी तनाव बढ़ा सकता है। गलती होने पर खुद को दोष देने के बजाय उससे सीखना और आगे बढ़ना चाहिए। अपनी पसंद के कामों, जैसे टहलने, संगीत सुनने, बागवानी करने या कोई पुराना शौक पूरा करने के लिए समय निकालना भी जरूरी है। कई लोग सोचते हैं कि अधिक पैसा कमाने, पदोन्नति मिलने या सभी जिम्मेदारियां पूरी होने के बाद ही वे खुश रह पाएंगे। लेकिन भविष्य की योजनाओं के साथ वर्तमान के छोटे पलों का आनंद लेना भी जरूरी है। हालांकि, यदि कई सप्ताह तक उदासी बनी रहे, पसंदीदा गतिविधियों में रुचि कम हो जाए या नींद और दैनिक कामकाज प्रभावित होने लगें, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।
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