नई दिल्ली । लोकसभा में सीटों की संख्या को 543 से बढ़ाकर 850 करने के प्रस्ताव के साथ ही महिला आरक्षण और नए परिसीमन पर मोदी सरकार और विपक्षी दलों के बीच गहरा राजनीतिक गतिरोध बना हुआ है। हाल ही में, मोदी सरकार द्वारा लाया गया संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण गिर गया, जिससे महत्वपूर्ण संवैधानिक बदलाव पर सर्वसम्मति बनाने की मोदी सरकार की राह को और कठिन बना दिया है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू लगातार विपक्ष से बातचीत का दावा कर रहे हैं और इस राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर रचनात्मक सहयोग की अपील कर रहे हैं, लेकिन विभिन्न दलों के स्पष्टतः अलग-अलग रुख के कारण फिलहाल समाधान दूर की कौड़ी प्रतीत हो रहा है।
मोदी सरकार का इरादा 2029 के आम चुनाव से पहले महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का है। इसी उद्देश्य से संसद द्वारा 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम, जो महिला आरक्षण से जुड़ा है, को नए परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़ा गया है। इस लेकर अप्रैल माह में प्रस्तुत किए गए विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े थे, जो संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से कम थे। इस असफलता के बाद मोदी सरकार ने इससे जुड़े अन्य दो विधेयकों को भी वापस ले लिया था। विपक्षी गुट में, कांग्रेस का स्पष्ट मत है कि महिला आरक्षण मौजूदा 543 सीटों में से ही लागू किया जाना चाहिए, न कि सीटों की संख्या बढ़ाने के बाद लागू होना चाहिए। पार्टी नेता राहुल गांधी ने लोकसभा की सीटें बढ़ाने के प्रस्ताव को तमिलनाडु जैसे उन राज्यों के लिए अनुचित बताया है, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त की है, और उन्होंने वर्तमान सीटों की संख्या पर 25 साल की और रोक लगाने की मांग की है। वहीं, समाजवादी पार्टी, जो कि विधेयक को गिराने में अहम भूमिका निभाई थी, बिना पर्याप्त आबादी और जातिगत आंकड़ों के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदलने पर सवाल उठा रही है। पार्टी को आशंका है कि इससे राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन अनुचित तरीके से प्रभावित होगा और उत्तर प्रदेश के राजनीतिक नक्शे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
दक्षिण भारत की बड़ी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) भी मौजूदा सीटों को बरकरार रखने और परिसीमन से जोड़े बिना महिला आरक्षण लागू करने के पक्ष में है। पार्टी को दक्षिण भारतीय राज्यों के प्रतिनिधित्व में संभावित कमी का डर है, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में महत्वपूर्ण सफलताएं हासिल की हैं। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) भी संविधान संशोधन विधेयक का विरोध कर रही है, हालांकि हाल के राज्य विधानसभा चुनावों में हार और पार्टी के भीतर सांसदों की बगावत के बाद लोकसभा में उसकी ताकत और राजनीतिक प्रभाव काफी कम हुआ है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) भी विधेयक के विरोध में है, लेकिन उसके पास अब लोकसभा में केवल तीन सांसद हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार गुट) ने विधेयक को समर्थन देने के संकेत दिए हैं, लेकिन उसने सुझाव दिया है कि लोकसभा की सीटों में बढ़ोतरी सभी राज्यों में 50 फीसदी के समानुपातिक अनुपात में होनी चाहिए। पार्टी को आशंका है कि केवल आबादी के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण करने से उन राज्यों को नुकसान होगा जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में सफलता पाई है। वाम दल तो लोकसभा की मौजूदा सदस्य संख्या पर लगी रोक को जारी रखने के पूरी तरह पक्षधर हैं। इन गंभीर मतभेदों के बीच, सरकार के सामने महिला आरक्षण लागू करने, लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने और परिसीमन के तरीके पर व्यापक राजनीतिक सर्वसम्मति बनाना एक जटिल और दूरगामी चुनौती बनी हुई है।


