राज्य और राजनीति
चंदन मिश्र
झारखंड के वर्तमान, पूर्व और पूर्ववर्ती विधायकों को सरकार बीस – बीस डिसमिल जमीन देगी। यानी माननीयों पर सरकार खास मेहरबान है। हालांकि जमीन वितरण की यह योजना अब तक पूर्ण हो जाती, लेकिन ‘ऊपर वाले ‘ को शायद अभी यह मंजूर नहीं है। इसके पहले बाबुओं पर सरकार यह ‘ कृपा ‘ बरसा चुकी है। राज्य के आईएएस अफसरों को जमीन मिल चुकी है। पहले माननीयों को ही इस जमीन वितरण योजना का लाभ मिलना था, लेकिन अभी उनके भाग्य में यह बदा नहीं है। यह योजना या प्रस्ताव बहुत पुराना है, लेकिन इसकी घोषणा हेमंत सोरेन सरकार ने दुबारा की है। कुछ तकनीकी अड़चन के कारण फिलहाल यह योजना लटकती नजर आ रही है। सरकार चाहती है कि उनके किसी भी जनप्रतिनिधि को वर्तमान के साथ साथ भविष्य में किसी तरह की परेशानी न हो। सभी सानंद अपनी जिंदगी जीएं। लेकिन सिर्फ सरकार के चाहने से तो क्या होता है, बाबुओं के चाहे बगैर क्या यह संभव है ? माननीयों को सरकार वह सबकुछ देने को तैयार है, जो उनके जीवन को आसान कर दे। झारखंड के माननीयों का वेतन, भत्ता, चिकित्सा सुविधा, यात्रा सुविधा सब कुछ उन्नत श्रेणी का है।
वर्तमान में प्रत्येक विधायक पर वेतन, भत्ता, यात्रा भत्ता और अन्य सुविधाएं मिलाकर डेढ़ से दो लाख रुपये मासिक खर्च आता है। उनके वेतन भत्ते पर कोई आयकर (इंकम टैक्स ) नहीं देना होता है। उन्हें शून्य सूद पर वाहन खरीदने के लिए दस लाख तक ऋण मिलता है। न्यूनतम सूद पर आवास बनाने के लिए ऋण मिलता है।सरकार अब उन्हें और उनके परिवार को अव्वल दर्जे की चिकित्सा सुविधा भी देने का निर्णय ले चुकी है जो आईएएस और आईपीएस अफसरों को मिलता है। पूर्व विधायकों को भी यह सुविधा मिलेगी। बस उनकी पेंशन और कुछ भत्ता वर्तमान विधायकों की तुलना में थोड़ा कम होता है, शेष सुविधाएं वैसी ही होती हैं। बस माननीयों को अब जमीन की कमी थी, जिसे जल्द से जल्द पूरा करने की कोशिश की जाएगी। माननीयों के बाद झारखंड के बाबुओं ( आईएएस और आईपीएस) अफसरों की भी बल्ले बल्ले है। उन्हें भारतीय सेवा संहिता के तहत वेतन, भत्ता और चिकित्सा सुविधा तो है ही, राज्य सरकार ने उन्हें जमीन भी उपलब्ध करा दी है। वैसे भी झारखंड के अधिसंख्य आईएएस और आईपीएस अफसरों की आमदनी मासिक वेतन भत्ते से नहीं आंकने चाहिए। कई अफसरों ने तो अपनी संपत्ति की अधिघोषणा में कई फ्लैट, मकान, भूखंड और अन्य चल अचल सम्पत्तियों का उल्लेख किया है। अर्थात उन्हें न तो जमीन की कमी है न ही इलाज कराने के लिए धन की, फिर भी राज्य सरकार जी भर कर उनके ऊपर सब कुछ लुटा रही है। दूसरी ओर आम आदमी को देखिये।
एक गरीब आदमी को सरकारी योजना का आवास लेने में कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। रिश्वत अलग से देने पड़ते हैं, फिर भी योजना की पूरी राशि उन्हें नहीं मिलती है। राज्य के वकील, पत्रकार और कम वेतन पेंशन पाने वाले अर्ध सरकारी, निगम और बोर्ड के कर्मी पेंशन बढ़ाने की मांग करते, करते मर खप गए और कई उसी लाइन में खड़े हैं, लेकिन झारखंड की सरकार के कानों में उनकी मांगें और आवाज नहीं पहुंच रही है। राज्य के श्रमजीवी पत्रकार और वकील सामान्य सुविधाएँ देने की माँग कर के थक चुके हैं, लेकिन सरकार उधर झांकती तक नहीं है। पत्रकारों ने रिटायर्ड पत्रकारों के लिए पेंशन, चिकित्सा सुविधा और खुद व् परिवार के लिए सामाजिक सुरक्षा की गुहार लगा रहे हैं, सरकार ने आज तक उधर कभी ध्यान ही नहीं दिया। लब्बोलुआब यह है कि जिसके सिर पर तेल है , सरकार उनके सिर और तेल डाल रही है। जिनका सिर सूखा है, वह सूखा ही रह जाएगा। माननीयों पर सरकार मेहरबान, आम आदमी है हलकान। अफसरों की तो है बल्ले बल्ले।


