धर्मांतरित व्यक्तियों को एसटी आरक्षण के लाभ से वंचित करने की उठी मांग, लाल किला समागम के बाद राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री तक पहुंची आवाज
आस्था बदली तो आरक्षण क्यों? जनजाति सुरक्षा मंच ने दोहरे लाभ के खिलाफ खोला मोर्चा
ब्यूरो
दुमका। जनजातीय समाज की सांस्कृतिक अस्मिता, पारंपरिक आस्था और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा को लेकर ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ ने एक बार फिर अपनी आवाज बुलंद की है। मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक डॉ. राजकिशोर हांसदा के नेतृत्व में दुमका परिसदन में आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान हाल ही में दिल्ली के लाल किला मैदान में संपन्न हुए ‘जनजाति समागम-2026’ के निष्कर्षों और समाज की लंबित मांगों को प्रमुखता से सामने रखा गया।
प्रेस वार्ता में डॉ. हांसदा ने स्पष्ट रूप से कहा कि जनजाति समागम केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं था, बल्कि यह देशभर के जनजातीय समाज की पहचान, परंपरा और अधिकारों की रक्षा का एक राष्ट्रीय संकल्प था। उन्होंने जोर देकर कहा कि जनजातीय पहचान केवल संवैधानिक सूची का विषय नहीं है, बल्कि यह पारंपरिक आस्था, संस्कृति, सामाजिक रीति-रिवाजों और सामुदायिक जीवन-पद्धति से गहराई से जुड़ी है।

धर्मांतरण और दोहरे आरक्षण के लाभ पर प्रहार
मंच का कड़ा मत है कि जो व्यक्ति अपनी मूल जनजातीय आस्था, संस्कृति और सामाजिक परंपराओं का परित्याग कर देता है, उसे अनुसूचित जनजाति (एसटी) के संवैधानिक दर्जे और उससे जुड़े लाभों का पात्र नहीं माना जाना चाहिए। मंच की मुख्य मांग है कि धर्मांतरित हो चुके जनजातीय व्यक्तियों को आरक्षण के दोहरे लाभ से पूरी तरह वंचित किया जाए। इस विषय पर वर्ष 2009-10 से देशव्यापी अभियान चलाया जा रहा है, जिसे विभिन्न राज्यों के जनजातीय समुदायों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से लाखों लोगों का समर्थन मिला है।
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लाल किला समागम में गृह मंत्री के बड़े आश्वासन
डॉ. हांसदा ने बताया कि लाल किला मैदान में आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में देश के गृह मंत्री अमित शाह शामिल हुए थे। गृह मंत्री ने मंच के माध्यम से जनजातीय समाज को आश्वस्त किया कि समान नागरिक संहिता जनजातीय समुदायों पर लागू नहीं होगी। इसके साथ ही, पेसा कानून के अंतर्गत आने वाले राज्यों में इसे कड़ाई से लागू कराया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि देश से नक्सलवाद लगभग समाप्त हो चुका है और बचे हुए हिस्सों में भी इसे बहुत जल्द खत्म कर दिया जाएगा, साथ ही अवैध धर्मांतरण पर भी कड़ा रुख अपनाया जाएगा।

दिल्ली प्रवास के दौरान देश के विभिन्न प्रांतों से आए जनजाति समाज के 25 प्रतिष्ठित एवं प्रबुद्ध लोगों के एक प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की और अपनी मांगें उनके समक्ष रखीं। प्रधानमंत्री ने सभी मांगों को ध्यान से सुना और आश्वासन दिया कि सरकार इन विषयों पर गंभीरता से विचार कर रही है।
इसके बाद, 28 मई 2026 को जनजाति सुरक्षा मंच के प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से भी मुलाकात की और उन्हें एक ज्ञापन सौंपा। प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति से ‘संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950’ में आवश्यक संशोधन करने तथा जनजातीय पहचान से जुड़े मामलों में स्पष्ट और व्यावहारिक दिशा-निर्देश निर्धारित करने का आग्रह किया।

कानूनी जटिलताओं को दूर करने की मांग
प्रेस वार्ता के दौरान वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में जनजातीय पहचान से जुड़े मामलों में कई प्रशासनिक और कानूनी जटिलताएं हैं, जिसके कारण सामान्य जनजातीय नागरिकों को रोजमर्रा के जीवन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। मंच ने केंद्र सरकार से इस विषय पर एक स्पष्ट, सरल और प्रभावी कानूनी व्यवस्था लागू करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा केवल कानूनी व्याख्या का नहीं है, बल्कि करोड़ों जनजातीय लोगों के अस्तित्व से जुड़ा है।
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चलेगा व्यापक जनजागरण अभियान
जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक आस्था, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए आने वाले दिनों में एक व्यापक जनजागरण अभियान चलाने का भी आह्वान किया गया है ताकि समाज के अंतिम व्यक्ति तक इस संदेश को पहुंचाया जा सके। इस महत्वपूर्ण प्रेस वार्ता में मुख्य रूप से जनजाति सुरक्षा मंच के प्रांत संयोजक सुलेमान शंकर मुर्मू और सह-संयोजक माइकल मुर्मू भी उपस्थित रहे।


