जल, जंगल, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण झारखंड प्रदेश का संताल परगना प्रमंडल अपने अस्तित्व को लेकर आज किसी का मोहताज नहीं। चाहे सांस्कृतिक संरचना की बात हो या फिर सामाजिक, आर्थिक, वैचारिक, व्यवहारिक चैतन्य बोध की। इन क्षेत्रों के नागरिकों ने व्यवस्था के साथ कंधे से कंधा मिलाकर विकास की दौड़ को एक नया आयाम दिया। एक नई ऊँचाई प्रदान की। आपसी सौहार्द और भाईचारे की विस्मृत हो चुकी संस्कृति को विश्वास की तुला पर लाकर खड़ा कर दिया, किंतु जिस तरह अंग्रेजी हुकूमत की शासन व्यवस्था, उसके कायदे कानून, महाजनी प्रथा, शोषण, उत्पीड़न, अत्याचार के विरुद्ध अमर शहीद सिदो- कान्हू और चाँद-भैरव ने क्रांति का शंखनाद कर उनकी जड़ें हिलाकर रख दी थी, इतिहास में वह स्वर्णाक्षरों में अंकित हो चुका है , जिसकी गूँज इस धरती के रहने तक जारी रहेगी।
30 जून 1855 भारतीय इतिहास का वह दिन है, जब संताल परगना की धरती पर इन चार भाईयों ने केवल अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल नहीं फूंका था, बल्कि अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार और अमानवीय व्यवस्था के विरुद्ध जनचेतना का ऐसा शंखनाद किया था जिसकी गूंज आज भी सुनाई देती है। जंगल तराई में बसोबास करने वाले संताल समाज ने इसे “हूल” कहा अर्थात अन्याय के विरुद्ध व्यापक जनाक्रोश। यह केवल एक सशस्त्र संघर्ष नहीं था, यह नैतिक प्रतिरोध का विराट और अकल्पनीय अभियान था।
संताल हूल के 171 वर्ष बाद, जब हम अपने समय की ओर देखते हैं तो पाते हैं कि सत्ता का स्वरूप बदला है। चेहरे बदल गए हैं। संविधान आ गया है। लोकतंत्र स्थापित हो चुका है। लेकिन व्यवस्था की असाध्य बीमारियां आज भी उसी प्रकार समाज को भीतर से खोखला कर रही हैं। यदि वर्ष 1855 का हूल विदेशी शासन के विरुद्ध एक महान क्रांति का शंखनाद था, तो वर्तमान व्यवस्था का संभावित हूल भ्रष्टाचार, नैतिक पतन और संस्थागत गिरावट के विरुद्ध होना चाहिए।
संताल हूल की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उसने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग नहीं की थी। उसका मूल उद्देश्य था शोषण से मुक्ति। उस समय महाजन, साहूकार, भ्रष्ट कर्मचारी और औपनिवेशिक प्रशासन मिलकर गरीब किसानों और आदिवासियों का आर्थिक तथा सामाजिक दोहन कर रहे थे। न्याय बिकता था, प्रशासन पक्षपाती था और सत्ता जनविरोधी बन चुकी थी। यही परिस्थितियाँ अंततः विस्फोट का कारण बनीं।
आज परिदृश्य अलग है, लेकिन प्रश्न वही खड़ा है। क्या भ्रष्टाचार केवल रिश्वतखोरी तक सीमित है ? नहीं। जब योग्यता की जगह सिफारिश अपना स्थान ले लेती है, जब जनसेवा की जगह निजी लाभ सर्वोपरि हो जाता है, जब राजनीति आम नागरिकों की सेवा के स्थान पर स्वार्थ का रूप ले लेती है, जब शिक्षा प्रमाण पत्रों का बाजार और स्वास्थ्य व्यापार का केंद्र बन जाता है, तब भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अपराध नहीं रहता। वह समाज के चरित्र पर हमला बन जाता है।
सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं, बल्कि कई स्थानों पर सामान्य व्यवहार के रूप में स्वीकार किया जाने लगा है। व्यवस्था से लेकर व्यक्ति तक। विचार से लेकर व्यवहार तक। भाषा से लेकर राजनीति तक गिरावट की यह प्रक्रिया निरंतर तेज होती जा रही है। ईमानदारी को मूर्खता और बेईमानी को चतुराई समझने की मानसिकता किसी भी सभ्य समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
संताल हूल हमें सिखाता है कि किसी भी व्यवस्था की वास्तविक शक्ति जनता का विश्वास होता है। जब यह विश्वास टूटता है, तब असंतोष जन्म लेता है। सिद्धो और कान्हू ने लोगों को हथियार उठाने से पहले आत्म सम्मान जगाने का काम किया था। उन्होंने बताया था कि अन्याय को चुपचाप सहना भी अन्याय को बढ़ावा देना है।
आज आवश्यकता किसी हिंसक विद्रोह की नहीं, बल्कि नैतिक हूल की है। ऐसा हूल जो व्यक्ति के भीतर से शुरू हो। जो रिश्वत लेने वाले से पहले रिश्वत देने वाले की विवशता समाप्त करे। जो सरकारी कार्यालयों में पारदर्शिता बढ़ाए। जो राजनीति को सेवा का माध्यम बनाए। जो शिक्षा में चरित्र निर्माण को पुनः प्रतिष्ठित करे। जो युवाओं को केवल रोजगार नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का भी बोध कराए, किंतु विडंबना यह है कि हम प्रतिवर्ष हूल दिवस मनाते हैं। सिद्धो-कान्हू की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण करते हैं, उनके नाम पर कार्यक्रम आयोजित करते हैं, लेकिन उनके मूल संदेश को जीवन में उतारने का साहस नहीं दिखा पाते। यदि हूल केवल स्मृति बनकर रह जाए और उसका मूल्यबोध हमारे सार्वजनिक जीवन से गायब हो जाए, तो वह इतिहास का उत्सव भर रह जाएगा, प्रेरणा का स्रोत नहीं।
आज आवश्यकता है कि प्रशासन अपनी जवाबदेही को मजबूत करे, राजनीति अपनी विश्वसनीयता वापस अर्जित करे, न्याय व्यवस्था आमजन के विश्वास को और दृढ़ बनाए तथा समाज स्वयं भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहिष्णुता का वातावरण निर्मित करे। डिजिटल तकनीक, सूचना का अधिकार, सामाजिक जागरूकता और सक्रिय नागरिकता इस दिशा में प्रभावी साधन बन सकते हैं, यदि उनके साथ नैतिक प्रतिबद्धता भी जुड़ी हो। 1855 का हूल हमें यह भी सिखाता है कि परिवर्तन केवल नेताओं से नहीं आता। जागृत समाज ही इतिहास की दिशा बदलता है। सिद्धो-कान्हू किसी महल से नहीं निकले थे। वे जनमानस की पीड़ा से निकले थे। इसलिए आज यदि नया हूल होना है तो उसकी शुरुआत संसद से पहले समाज में, कानून से पहले चरित्र में और शासन से पहले नागरिक चेतना में करनी होगी।
भारत आज विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में स्थान बनाने की ओर अग्रसर है। विज्ञान, तकनीक, आधारभूत संरचना और वैश्विक प्रतिष्ठा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त हुई हैं। किंतु यदि इन उपलब्धियों की नींव भ्रष्टाचार, अवसरवाद और नैतिक पतन से कमजोर होती रही, तो विकास का यह भवन अधिक समय तक स्थिर नहीं रह सकेगा। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि उसका नैतिक चरित्र होता है। संताल हूल की प्रासंगिकता इसी संदेश में निहित है कि अन्याय चाहे विदेशी शासन करे या अपने ही समाज का कोई तंत्र, उसका प्रतिकार आवश्यक है। आज का हूल बंदूक का नहीं, संविधान का। हिंसा का नहीं, जनजागरण का। विनाश का नहीं, नैतिक पुनर्जागरण का होना चाहिए।
यदि हम सचमुच सिदो-कान्हू और उनके साथियों को श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो उनकी प्रतिमाओं पर पुष्प चढ़ाने से अधिक आवश्यक है कि हम अपने भीतर और अपने सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व का दीप जलाएँ। यही 1855 के हूल की सच्ची विरासत है और यही आज के भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता भी। आज जब भ्रष्टाचार व्यवस्था की नसों में और नैतिक पतन समाज की चेतना में प्रवेश कर चुका है, तब इतिहास फिर हमें पुकार रहा है। प्रश्न केवल इतना है क्या हम उस पुकार को सुनने के लिए तैयार हैं ? यदि हाँ, तो समय आ गया है कि भारत एक और हूल का साक्षी बने। ऐसा हूल जो मनुष्य को स्वयं से, समाज को अपने दायित्व से और शासन को उसकी जवाबदेही से परिचित कराए।


