नोएडा । सरकारी और निजी स्कूलों में दाखिले के समय अक्सर आधार कार्ड को अनिवार्य बताया जाता है, इससे अभिभावकों में भ्रम पैदा होता है। लेकिन कानून और अदालत दोनों ने स्पष्ट किया है कि बिना आधार के भी बच्चों को स्कूल में प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता। भारत में शिक्षा का अधिकार, 2009 (आरटीई) के तहत 6 से 14 साल के हर बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है। यह अधिकार मौलिक अधिकार की श्रेणी में आता है। आरटीआई कानून के अनुसार, किसी भी बच्चे को दस्तावेज़ों की कमी के कारण स्कूल में दाखिले से नहीं रोका जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में अपने फैसले (पुट्टास्वामी केस) में स्पष्ट किया कि स्कूल दाखिले के लिए आधार कार्ड अनिवार्य नहीं है। यानी कोई भी स्कूल केवल आधार न होने के कारण प्रवेश देने से इनकार नहीं कर सकता। उम्र प्रमाण के लिए जन्म प्रमाण पत्र, अस्पताल का रिकॉर्ड या अभिभावक का घोषणा पत्र स्वीकार किया जा सकता है। अगर ये भी नहीं हैं, तब भी स्कूल बच्चे को दाखिला देने से मना नहीं कर सकता।
हाल ही में हरियाणा में लोक शिक्षण निदेशालय ने भी सर्कुलर जारी कर बताया कि आधार या अन्य पहचान पत्र के बिना बच्चों का दाखिला सुनिश्चित किया जाए। इसका विशेष जोर प्रवासी मजदूर और वंचित वर्ग के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने पर है। फिर भी, जमीनी स्तर पर कई स्कूल दस्तावेजों की मांग करते हैं और दाखिला देने से इनकार कर देते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह कानून की गलत व्याख्या और प्रशासनिक कमी के कारण होता है। यदि स्कूल दाखिला देने से मना करे, तब अभिभावक आरटीई कानून की जानकारी देकर शिकायत कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर जिला शिक्षा अधिकारी या उच्च न्यायालय तक भी मामला ले जाया जा सकता है। आरटीई के अन्य महत्वपूर्ण प्रावधानों में निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षण आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए, किसी भी प्रकार की डोनेशन या कैपिटेशन फीस पर रोक, दाखिले के लिए इंटरव्यू या टेस्ट न होना, और 8वीं तक नो डिटेंशन पॉलिसी शामिल हैं। कानून स्पष्ट है शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है, न कि दस्तावेज़ों पर आधारित सुविधा। आधार कार्ड न होने पर भी किसी बच्चे को स्कूल से बाहर रखना न केवल गलत है, बल्कि कानून का उल्लंघन भी है।
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