राज्य और राजनीति
चंदन मिश्र
झारखंड में पांच साल के बाद नगर निकाय के चुनाव हो रहे हैं। शहर की सरकार बनाने के लिए शहरी नागरिकों से ज्यादा सूबे के राजनीतिक दल सक्रिय हैं। सभी नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायत में एकसाथ चुनाव हो रहे हैं। प्रचार का शोर गुल थम चुका है। सोमवार को वोट डाले जाएंगे। नगर निकाय चुनाव दलीय आधार पर नहीं हो रहे हैं, लेकिन राजनीतिक दलों का इस चुनाव में सीधा हस्तक्षेप है। लिहाजा इस चुनाव में सत्ताधारी झामुमो, कांग्रेस, राजद और वामदलों के अलावा प्रमुख विपक्षी दल भाजपा सीधे तौर पर चुनाव मैदान में हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि दलों के चुनाव चिन्ह और झंडों का प्रयोग नहीं हो रहा है, बाकी वो सबकुछ हो रहा है जो आम चुनावों में होता आया है। गैर दलीय इस चुनाव में सभी दलों के नेताओं की प्रतिष्ठा उनके दलों के साथ दांव पर लगी है। उम्मीदवारों की हार और जीत से उनकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी और घटेगी।
राज्य के नौ नगर निगम के अलावा तीन दर्जन नगर परिषद और नगर पंचायत के चुनाव में भाजपा और झामुमो, कांग्रेस के नेताओं में मंत्री, सांसद और विधायक अपनी सब कुछ झोंक चुके हैं। भाजपा ने अपने सभी सांगठनिक नेताओं के अलावा सभी सांसदों और विधायकों को इलाकावार जिम्मेवारी सौंप दी है कि उनके क्षेत्र के उम्मीदवार की हार जीत का दारोमदार उनके ऊपर होगा। भाजपा ने तो अपने एक राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह को बाकायदा पिछले एक पखवाड़े से झारखंड में तैनात कर दिया है। अरुण सिंह जिला दर जिला घूम रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहु अपनी पूरी टीम के साथ हर क्षेत्र में घूम घूम कर उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने में जुटे हैं। क्षेत्र के सांसद और विधायक भी अपने अपने इलाके में पार्टी समर्थित उम्मीदवारों को जिताने के लिए दिन रात एक किए हुए हैं। उनकी प्रतिष्ठा के साथ साथ उनके राजनीतिक वजूद का भी सवाल इस चुनाव से जुड़ा है। झारखंड में विधानसभा का बजट सत्र चल रहा है,लेकिन नगर निकाय चुनाव की वजह से विधानसभा विधायकों की गैर हाजिरी से खाली खाली दिखाई देती है। अब 23 फरवरी चुनाव की तारीख के बाद से ही विधानसभा विधायकों से गुलज़ार होगी।
झारखंड के निकाय चुनाव सत्तारूढ़ दलों के साथ-साथ विपक्षी दलों के लिए शक्ति परीक्षण का बड़ा मैदान साबित होगा। 2025 के विधानसभा के चुनाव हुए लगभग सवा साल होने वाले हैं। झामुमो, कांग्रेस और राजद गठबंधन ने बड़ी जीत हासिल कर राज्य की सत्ता में लगातार दूसरी बार काबिज हुई है। उसके बावजूद झारखंड में होनेवाले शहरी सरकार के चुनाव एक बार फिर से राजनीतिक दलों की ताकत की जोर आजमाइश देखने को मिल रही है। इसका अंतिम रूप देखने को मिल रहा है। झारखंड में नौ नगर निगम हैं। इनमें सभी पांचों प्रमंडल के मुख्यालय शामिल हैं। रांची, धनबाद,चास, हजारीबाग, दुमका, देवघर, गिरिडीह, मेदिनीनगर, जमशेदपुर के मानगो और आदित्यपुर जैसे शहर शामिल हैं। इन शहरों में विधानसभा और लोकसभा चुनाव के दौरान दलों को वोटरों ने अपना समर्थन दे दिया है। लेकिन विधानसभा और लोकसभा से नगर निकाय चुनाव भिन्न होता है। इसमें शहरी और अर्ध शहरी क्षेत्र के आम नागरिक स्थानीय समस्याओं को लेकर अपना प्रतिनिधि चुनते हैं। इसलिए यहां हर प्रतिनिधि को वोटर अच्छी तरह से वाकिफ होते हैं।
झारखंड में झामुमो के सबसे बड़े दल और सत्तारूढ़ दल होने के कारण सबसे अधिक दबदबा है। लेकिन शहरी क्षेत्रों में भाजपा के वोटर अपेक्षाकृत ज्यादा हैं। इसलिए पिछले निकाय चुनावों में भाजपा के समर्थित प्रतिनिधि ज्यादा चुनकर आए थे। यहां तक कि प्रमुख नगर निगमों में भाजपा समर्थित उम्मीदवार मेयर बने। नगरपालिका और नगर पंचायत के अधिकतर प्रतिनिधि भाजपा समर्थित ही जीते। गौर करनेवाली बात है कि 2015 और 2016 के निकाय चुनाव के दौरान झारखंड में भाजपा की सरकार थी। चुनाव में सरकार होने का लाभ और दबदबा अलग से दिखाई पड़ा। इस बार भी सभी नौ नगर निगमों में सत्तारूढ़ झामुमो का दबदबा दिखेगा या नहीं, यह तो चुनाव और चुनाव के बाद उसका परिणाम बताएगा। लेकिन सत्तारूढ़ दल की ओर से झामुमो समर्थित उम्मीदवारों को दिलाने की भरपूर कोशिश हो रही है, ऐसा मुख्य विपक्षी दल भाजपा का आरोप है। भाजपा ने यह आरोप लगाया है कि सत्तारूढ़ दल झामुमो सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग कर रहा है।
फिर भी भाजपा ने नगर निकाय चुनाव को पूरी शिद्दत के साथ लड़ने की ठानी है। इसलिए भाजपा नगर निगम से लेकर वार्ड पार्षद तक के संभावित उम्मीदवारों की सूची तैयार कर समर्थन कर रही है। भाजपा के नए नेतृत्व को लेकर यह बहुत बड़ी चुनौती है। झारखंड के आदित्य साहु के लिए झारखंड का निकाय चुनाव पहली अग्नि परीक्षा साबित होगी। उनके नेतृत्व क्षमता का परीक्षण होगा। इसलिए आदित्य साहु अपनी पूरी टीम के साथ चुनाव में पूरी ताकत झोंक चुके हैं।
निकाय चुनाव में सत्तारूढ़ दलों में कांग्रेस कुछ स्थानों पर मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है, तो कहीं झामुमो का जोर है।कहीं कहीं दोनों दल आमने सामने भिड़ते दिखाई दे रहे हैं।
रांची नगर निगम क्षेत्र की प्रत्याशी कांग्रेस की नेता रमा खलखो मेयर का चुनाव पहले जीत चुकी हैं। इस बार वह फिर चुनाव मैदान में दिखाई पड़े रहीं। लेकिन झामुमो की अंदरूनी इच्छा है कि उनका उम्मीदवार इस बार रांची के मेयर पद को सुशोभित करे। अब देखना दिलचस्प होगा कि रांची में दोनों सत्तारूढ़ दलों में किसका उम्मीदवार अंतिम तौर पर मैदान में उतरता है। कांग्रेस पार्टी समर्थित एक और उम्मीदवार चुनाव मैदान में दिखाई दे सकता है। जमशेदपुर के एक नगर निगम से पूर्व हेमंत सरकार की कैबिनेट में मंत्री रहे बन्ना गुप्ता की पत्नी चुनाव मैदान में हैं। धनबाद से झामुमो समर्थित उम्मीदवार मैदान में हैं। इसी तरह दुमका में भी झामुमो समर्थित उम्मीदवार मैदान में हैं।
हर नगर निगम में दलीय समर्थित उम्मीदवार मैदान में उतर चुके हैं और इनमें कई हेवीवेट रह चुके हैं। चुनाव रणनीति में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से लेकर नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी, सरकार के मंत्री, विधायक, सांसद और विपक्ष की ओर से पार्टी अध्यक्ष सहित सांसद विधायक चुनावी गोटी बिछाने में जुट गए हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव की इस शतरंजी चाल में किसकी जीत होती है और किसकी मात। लेकिन इतना तय है कि सूबे के निकाय चुनाव में एक – एक निकाय में हर दल के एक से ज्यादा उम्मीदवार अपनी पार्टी के नेताओं के साथ आपस में गुत्थम गुत्था होते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि यह तय है कि जो उम्मीदवार अपने परिवार की लड़ाई से उबर पाएंगे, वही अपने प्रतिद्वंद्वियों पर जीत हासिल करेंगे। कुल मिलाकर इस बार सूबे का नगर निकाय चुनाव बहुत दिलचस्प होनेवाला है।
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